भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह पापियोंके साथ किसी तरह भी सम्पर्क न स्थापित करे ।। २३ ।।

ऐल उवाच

साध्वसाधून् धारयतीह भूमिः साध्वसाधूंस्तापयतीह सूर्यः । साध्वसाधूंश्चापि वातीह वायु- रापस्तथा साध्वसाधून् पुनन्ति ॥ २४ ॥ पुरूरवा बोले—इस जगत्में पृथिवी तो पापियों और पुण्यात्माओंको समान रूपसे धारण करती है। सूर्य भी भले-बुरोंको एक-सा ही संताप देते हैं। वायु साधु और दुष्ट दोनोंका स्पर्श करती है और जल पापी एवं पुण्यात्मा दोनोंको पवित्र करता है ।। २४ ।।

कश्यप उवाच

एवमस्मिन् वर्तते लोक एव नामुत्रैवं वर्तते राजपुत्र । प्रेत्यैतयोरन्तरावान् विशेषो यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम् ॥ २५ ॥ कश्यपने कहा—राजकुमार! इस लोकमें ही ऐसी बात देखी जाती है, परलोकमें इस प्रकारका बर्ताव नहीं है। जो पुण्य करता है वह और जो पाप करता है वह—दोनों जब मृत्युके पश्चात् परलोकमें जाते हैं तो वहाँ उन दोनोंकी स्थितिमें बड़ा भारी अन्तर हो जाता है ।। २५ ।।

पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चि- र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः । तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥ २६ ॥ पुण्यात्माका लोक मधुरतम सुखसे भरा होता है। वहाँ घीके चिराग जलते हैं। उसमें सुवर्णके समान प्रकाश फैला रहता है। वहाँ अमृतका केन्द्र होता है। उस लोकमें न तो मृत्यु है, न बुढ़ापा है और न दूसरा ही कोई दुःख है। ब्रह्मचारी पुरुष मृत्युके पश्चात् उसी स्वर्गादि लोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करता है ।। २६ ।।

पापस्य लोको निरयोऽप्रकाशो नित्यं दुःखं शोकभूयिष्ठमेव । तत्रात्मानं शोचति पापकर्म बह्वीः समाः प्रतपन्नप्रतिष्ठः ॥ २७ ॥