महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपापीका लोक नरक है, जहाँ सदा अँधेरा छाया रहता है। वहाँ प्रतिदिन दुःख तथा अधिक-से-अधिक शोक होता है। पापात्मा पुरुष वहाँ बहुत वर्षोंतक कष्ट भोगता हुआ कभी एक स्थानपर स्थिर नहीं रहता और निरन्तर अपने लिये शोक करता रहता है॥ २७॥
मिथोभेदाद् ब्राह्मणक्षत्रियाणां प्रजा दुःखं दुःसहं चाविशन्ति। एवं ज्ञात्वा कार्य एवेह नित्यं पुरोहितो नैकविद्यो नृपेण॥ २८॥
ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें परस्पर फूट होनेसे प्रजाको दुःसह दुःख उठाना पड़ता है। इन सब बातोंको समझ-बूझकर राजाको चाहिये कि वह सदाके लिये एक सदाचारी बहुज्ञ पुरोहित बना ही ले॥ २८॥
तं चैवान्वभिषिच्येत तथा धर्मो विधीयते। अग्र्यो हि ब्राह्मणः प्रोक्तः सर्वस्यैवेह धर्मतः॥ २९॥
राजा पहले पुरोहितका वरण कर ले। उसके बाद अपना अभिषेक करावे। ऐसा करनेसे ही धर्मका पालन होता है; क्योंकि धर्मके अनुसार ब्राह्मण यहाँ सबसे श्रेष्ठ बताया गया है॥ २९॥
पूर्वं हि ब्रह्मणः सृष्टिरिति ब्रह्मविदो विदुः। ज्येष्ठेनाभिजनेनास्य प्राप्तं पूर्वं यदुत्तरम्॥ ३०॥
वेदवेत्ता विद्वानोंका यह मत है कि सबसे पहले ब्राह्मणकी ही सृष्टि हुई है; अतः ज्येष्ठ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेके कारण प्रत्येक उत्कृष्ट वस्तुपर सबसे पहले ब्राह्मणका ही अधिकार होता है॥ ३०॥
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक्। सर्वं श्रेष्ठं विशिष्टं च निवेद्यं तस्य धर्मतः॥ ३१॥ अवश्यमेव कर्तव्यं राज्ञा बलवतापि हि।
इसलिये ब्राह्मण सब वर्णोंका सम्माननीय और पूजनीय है। वही भोजनके लिये प्रस्तुत की हुई सब वस्तुओंको सबसे पहले भोगनेका अधिकारी है। सभी श्रेष्ठ और उत्तम पदार्थोंको धर्मके अनुसार पहले ब्राह्मणकी सेवामें ही निवेदित करना चाहिये। बलवान् राजाको भी अवश्य ऐसा ही करना चाहिये॥ ३१ १/२॥
ब्रह्म वर्धयति क्षत्रं क्षत्रतो ब्रह्म वर्धते। एवं राज्ञा विशेषेण पूज्या वै ब्राह्मणाः सदा॥ ३२॥ (राज्ञः सर्वस्य चान्यस्य स्वामी राजपुरोहितः।)
ब्राह्मण क्षत्रियको बढ़ाता है और क्षत्रियसे ब्राह्मणकी उन्नति होती है। अतः राजाको विशेषरूपसे सदा ही ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि राजपुरोहित राजाका तथा