महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 516, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे सब प्राणी मेघोंके और पक्षी वृक्षोंके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार सब मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाले राजाके आश्रित होकर जीवनयापन करते हैं॥ १३ ॥ न हि कामात्मना राज्ञा सततं कामबुद्धिना । नृशंसेनातिलुब्धेन शक्यं पालयितुं प्रजाः ॥ १४ ॥ जो राजा कामासक्त हो सदा कामका ही चिन्तन करनेवाला, क्रूर और अत्यन्त लोभी होता है, वह प्रजाका पालन नहीं कर सकता ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
नाहं राज्यसुखान्वेषी राज्यमिच्छाम्यपि क्षणम् । धर्मार्थं रोचये राज्यं धर्मश्चात्र न विद्यते ॥ १५ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! मैं राज्यसे सुख मिलनेकी आशा रखकर कभी एक क्षणके लिये भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं करता। मैं तो धर्मके लिये ही राज्यको पसंद करता था; परंतु मालूम होता है कि इसमें धर्म नहीं है ॥ १५ ॥ तदलं मम राज्येन यत्र धर्मो न विद्यते । वनमेव गमिष्यामि तस्माद् धर्मचिकीर्षया ॥ १६ ॥ जिसमें धर्म ही नहीं है, उस राज्यसे मुझे क्या लेना है? अतः अब मैं धर्म करनेकी इच्छासे वनमें ही चला जाऊँगा ॥ १६ ॥ तत्र मेध्येष्वरण्येषु न्यस्तदण्डो जितेन्द्रियः । धर्ममाराधयिष्यामि मुनिर्मूलफलाशनः ॥ १७ ॥ वहाँ वनके पावन प्रदेशोंमें हिंसाका सर्वथा त्याग कर दूँगा और जितेन्द्रिय हो मुनिवृत्तिसे रहकर फल-मूलका आहार करते हुए धर्मकी आराधना करूँगा ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
वेदाहं तव या बुद्धिरानृशंस्यगुणैव सा । न च शुद्धानृशंस्येन शक्यं राज्यमुपासितुम् ॥ १८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बुद्धिमें दया और कोमलतारूपी गुण ही भरा है; परंतु केवल दया एवं कोमलतासे ही राज्यका शासन नहीं किया जा सकता ॥ १८ ॥ अपि तु त्वां मृदुप्रज्ञमत्यार्यमतिधार्मिकम् । क्लीबं धर्मघृणायुक्तं न लोको बहु मन्यते ॥ १९ ॥ तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त कोमल है। तुम बड़े सज्जन और बड़े धर्मात्मा हो। धर्मके प्रति तुम्हारा महान् अनुग्रह है। यह सब होनेपर भी संसारके लोग तुम्हें कायर समझकर अधिक आदर नहीं देंगे ॥ १९ ॥