महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तं तु स्वमपेक्षस्व पितृपैतामहोचितम् । नैव राज्ञां तथा वृत्तं यथा त्वं स्थातुमिच्छसि ॥ २० ॥ तुम्हारे बाप-दादोंने जिस आचार-व्यवहारको अपनाया था, उसे ही प्राप्त करनेकी तुम भी इच्छा रखो। तुम जिस तरह रहना चाहते हो, वह राजाओंका आचरण नहीं है ॥ २० ॥
न हि वैक्लव्यसंसृष्टमानृशंस्यमिहास्थितः । प्रजापालनसम्भूतमाप्ता धर्मफलं ह्यसि ॥ २१ ॥ इस प्रकार व्याकुलताजनित कोमलताका आश्रय लेकर तुम यहाँ प्रजापालनसे सुलभ होनेवाले धर्मके फलको नहीं पा सकोगे ॥ २१ ॥
न ह्येतामाशिषं पाण्डुर्न च कुन्ती त्वयाचत । तथैतत् प्रज्ञया तात यथाऽऽचरसि मेधया ॥ २२ ॥ तात! तुम अपनी बुद्धि और विचारसे जैसा आचरण करते हो, तुम्हारे विषयमें ऐसी आशा न तो पाण्डुने की थी और न कुन्तीने ही ऐसी आशा की थी ॥
शौर्यं बलं च सत्यं च पिता तव सदाब्रवीत् । माहात्म्यं च महौदार्यं भवतः कुन्त्ययाचत ॥ २३ ॥ तुम्हारे पिता पाण्डु तुम्हारे लिये सदा कहा करते थे कि मेरे पुत्रमें शूरता, बल और सत्यकी वृद्धि हो। तुम्हारी माता कुन्ती भी यही इच्छा किया करती थी कि तुम्हारी महत्ता और उदारता बढ़े ॥ २३ ॥
नित्यं स्वाहा स्वधा नित्यं चोभे मानुषदैवते । पुत्रेष्वाशासते नित्यं पितरो दैवतानि च ॥ २४ ॥ प्रतिदिन यज्ञ और श्राद्ध—ये दोनों कर्म क्रमशः देवताओं तथा मानव-पितरोंको आनन्दित करनेवाले हैं। देवता और पितर अपनी संतानोंसे सदा इन्हीं कर्मोंकी आशा रखते हैं ॥ २४ ॥
दानमध्ययनं यज्ञं प्रजानां परिपालनम् । धर्ममेतदधर्मं वा जन्मनैवाभ्यजायथाः ॥ २५ ॥ दान, वेदाध्ययन, यज्ञ तथा प्रजाका पालन—ये धर्मरूप हों या अधर्मरूप। तुम्हारा जन्म इन्हीं कर्मोंको करनेके लिये हुआ है ॥ २५ ॥
काले धुरि च युक्तानां वहतां भारमाहितम् । सीदतामपि कौन्तेय न कीर्तिरवसीदति ॥ २६ ॥ कुन्तीनन्दन! यथासमय भार वहन करनेमें लगाये गये पुरुषोंपर जो राज्य आदिका भार रख दिया जाता है, उसे वहन करते समय यद्यपि कष्ट उठाना पड़ता है तथापि उससे उन पुरुषोंकी कीर्ति चिरस्थायी होती है, उसका कभी क्षय नहीं होता ॥ २६ ॥
समन्ततो विनियतो वहत्यस्खलितो हि यः । निर्दोषः कर्मवचनात् सिद्धिः कर्मण एव सा ॥ २७ ॥