भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 588

राजाको गुप्तचररूपी नेत्रोंके द्वारा देखकर सदा इस बातकी जानकारी रखनी चाहिये कि मेरे शत्रु, मित्र तथा तटस्थ व्यक्ति नगर और छोटे ग्रामोंमें कब क्या करना चाहते हैं? ॥ २१ ॥

ततस्तेषां विधातव्यं सर्वमेवाप्रमादतः । भक्तान् पूजयता नित्यं द्विषतश्च निगृह्णता ॥ २२ ॥ उनकी चेष्टाएँ जान लेनेके पश्चात् उनके प्रतीकारके लिये सारा कार्य बड़ी सावधानीके साथ करना चाहिये। राजाको उचित है कि वह अपने भक्तोंका सदा आदर करे और द्वेष रखनेवालोंको कैद कर ले ॥ २२ ॥

यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडया । प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं धर्मबाधकम् ॥ २३ ॥ उसे प्रतिदिन नाना प्रकारके यज्ञ करना तथा दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए दान देना चाहिये। वह प्रजाजनोंकी रक्षा करे और कोई भी कार्य ऐसा न करे जिससे धर्ममें बाधा आती हो ॥ २३ ॥

कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च योषिताम् । योगक्षेमं च वृत्तिं च नित्यमेव प्रकल्पयेत् ॥ २४ ॥ दीन, अनाथ, वृद्ध तथा विधवा स्त्रियोंके योगक्षेम एवं जीविकाका सदा ही प्रबन्ध करे ॥ २४ ॥

आश्रमेषु यथाकालं चैलभाजनभोजनम् । सदैवोपहरेद् राजा सत्कृत्याभ्यर्च्य मान्य च ॥ २५ ॥ राजा आश्रमोंमें यथासमय वस्त्र, बर्तन और भोजन आदि सामग्री सदा ही भेजा करे, तथा सबको सत्कार, पूजन एवं सम्मानपूर्वक वे वस्तुएँ अर्पित करे ॥ २५ ॥

आत्मानं सर्वकार्याणि तापसे राष्ट्रमेव च । निवेदयेत् प्रयत्नेन तिष्ठेत् प्रह्वश्च सर्वदा ॥ २६ ॥ अपने राज्यमें जो तपस्वी हों, उन्हें अपने शरीर-सम्बन्धी, सम्पूर्ण कार्यसम्बन्धी तथा राष्ट्रसम्बन्धी समाचार प्रयत्नपूर्वक बताया करे और उनके सामने सदा विनीतभावसे रहे ॥ २६ ॥

सर्वार्थत्यागिनं राजा कुले जातं बहुश्रुतम् । पूजयेत् तादृशं दृष्ट्वा शयनासनभोजनैः ॥ २७ ॥ जिसने सम्पूर्ण स्वार्थोंका परित्याग कर दिया है, ऐसे कुलीन एवं बहुश्रुत विद्वान् तपस्वीको देखकर राजा शय्या, आसन और भोजन देकर उसका सम्मान करे ॥ २७ ॥

तस्मिन् कुर्वीत विश्वासं राजा कस्याञ्चिदापदि । तापसेषु हि विश्वासमपि कुर्वन्ति दस्यवः ॥ २८ ॥