भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 589

कैसी भी आपत्तिका समय क्यों न हो? राजाको तो तपस्वीपर विश्वास करना ही चाहिये; क्योंकि चोर और डाकू भी तपस्वी महात्माओंपर विश्वास करते हैं ।।

तस्मिन् निधीनादधीत प्रज्ञां पर्याददीत च ।
न चाप्यभीक्ष्णं सेवेत भृशं वा प्रतिपूजयेत् ॥ २९ ॥
राजा उस तपस्वीके निकट अपने धनकी निधियोंको रखे और उससे सलाह भी लिया करे; परंतु बार-बार उसके पास जाना-आना और उसका सङ्ग न करे, तथा उसका अधिक सम्मान भी न करे (अर्थात् गुप्तरूपसे ही उसकी सेवा और सम्मान करे। लोगोंपर इस बातको प्रकट न होने दे) ॥ २९ ॥

अन्यः कार्यः स्वराष्ट्रेषु परराष्ट्रेषु चापरः ।
अटवीषु परः कार्यः सामन्तनगरेष्वपि ॥ ३० ॥
राजा अपने राज्यमें, दूसरोंके राज्योंमें, जंगलोंमें तथा अपने अधीन राजाओंके नगरोंमें भी एक-एक भिन्न-भिन्न तपस्वीको अपना सुहृद् बनाये रखे ॥ ३० ॥

तेषु सत्कारमानाभ्यां संविभागांश्च कारयेत् ।
परराष्ट्राटवीस्थेषु यथा स्वविषये तथा ॥ ३१ ॥
उन सबको सत्कार और सम्मानके साथ आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करे। जैसे अपने राज्यके तपस्वीका आदर करे, वैसे ही दूसरे राज्यों तथा जंगलोंमें रहनेवाले तापसोंका भी सम्मान करना चाहिये ॥ ३१ ॥

ते कस्याञ्चिदवस्थायां शरणं शरणार्थिने ।
राज्ञे दद्युर्यथाकामं तापसाः संशितव्रताः ॥ ३२ ॥
वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शरणार्थी राजाको किसी भी अवस्थामें इच्छानुसार शरण दे सकते हैं ॥ ३२ ॥

एष ते लक्षणोद्देशः संक्षेपेण प्रकीर्तितः ।
यादृशे नगरे राजा स्वयमावस्तुमर्हति ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार राजाको स्वयं जैसे नगरमें निवास करना चाहिये, उसका लक्षण मैंने यहाँ संक्षेपसे बताया है ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गपरीक्षायां
षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गपरीक्षाविषयक
छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥


१. धन्वदुर्गका दूसरा नाम मरुदुर्ग भी है। जिसके चारों ओर बालूका घेरा हो, उस किलेको धन्वदुर्ग कहते हैं।