भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

गाँवोंमें जो आय अथवा उपज हो, वह सब गाँवका अधिपति अपने ही पास रखे (तथा उसमेंसे नियत अंशका वेतनके रूपमें उपभोग करे)। उसीमेंसे नियत वेतन देकर उसे दस गाँवोंके अधिपतिका भी भरण-पोषण करना चाहिये, इसी तरह दस गाँवके अधिपतिको भी बीस गाँवोंके पालकका भरण-पोषण करना उचित है ॥ ६ ॥

ग्रामं ग्रामशताध्यक्षो भोक्तुमर्हति सत्कृतः । महान्तं भरतश्रेष्ठ सुस्फीतं जनसंकुलम् ॥ ७ ॥ तत्र ह्यनेकपायतं राज्ञो भवति भारत । जो सत्कारप्राप्त व्यक्ति सौ गाँवोंका अध्यक्ष हो, वह एक गाँवकी आमदनीको उपभोगमें ला सकता है। भरतश्रेष्ठ! वह गाँव बहुत बड़ी बस्तीवाला, मनुष्योंसे भरपूर और धन-धान्यसे सम्पन्न हो। भरतनन्दन! उसका प्रबन्ध राजाके अधीनस्थ अनेक अधिपतियोंके अधिकारमें रहना चाहिये ॥ ७ १/२ ॥

शाखानगरमर्हस्तु सहस्रपतिरुत्तमः ॥ ८ ॥ धान्यहैरन्यभोगेन भोक्तुं राष्ट्रियसङ्गतः । सहस्र गाँवका श्रेष्ठ अधिपति एक शाखानगर (कस्बे)-की आय पानेका अधिकारी है। उस कस्बेमें जो अन्न और सुवर्णकी आय हो, उसके द्वारा वह इच्छानुसार उपभोग कर सकता है। उसे राष्ट्रवासियोंके साथ मिलकर रहना चाहिये ॥ ८ १/२ ॥

तेषां संग्रामकृत्यं स्याद् ग्रामकृत्यं च तेषु यत् ॥ ९ ॥ धर्मज्ञः सचिवः कश्चित् तत् तत्पश्येदतन्द्रितः । इन अधिपतियोंके अधिकारमें जो युद्धसम्बन्धी तथा गाँवोंके प्रबन्धसम्बन्धी कार्य सौंपे गये हों, उनकी देखभाल कोई आलस्यरहित धर्मज्ञ मन्त्री किया करे ॥ ९ १/२ ॥

नगरे नगरे वा स्यादेकः सर्वार्थचिन्तकः ॥ १० ॥ उच्चैः स्थाने घोररूपो नक्षत्राणामिव ग्रहः । भवेत् स तान् परिक्रामेत् सर्वानैव सभासदः ॥ ११ ॥ अथवा प्रत्येक नगरमें एक ऐसा अधिकारी होना चाहिये, जो सभी कार्योंका चिन्तन और निरीक्षण कर सके। जैसे कोई भयंकर ग्रह आकाशमें नक्षत्रोंके ऊपर स्थित हो परिभ्रमण करता है, उसी प्रकार वह अधिकारी उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित होकर उन सभी सभासद् आदिके निकट परिभ्रमण करे और उनके कार्योंकी जाँच-पड़ताल करता रहे ॥ १०-११ ॥

तेषां वृत्तिं परिणयेत् कश्चिद् राष्ट्रेषु तच्चरः । जिघांसवः पापकामाः परस्वादायिनः शठाः ॥ १२ ॥ रक्षाभ्यधिकृता नाम तेभ्यो रक्षेदिमाः प्रजाः ।