भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 593

उस निरीक्षकका कोई गुप्तचर राष्ट्रमें घूमता रहे और सभासद् आदिके कार्य एवं मनोभावको जानकर उसके पास सारा समाचार पहुँचाता रहे। रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए अधिकारी लोग प्रायः हिंसक स्वभावके हो जाते हैं। वे दूसरोंकी बुराई चाहने लगते हैं और शठतापूर्वक पराये धनका अपहरण कर लेते हैं। ऐसे लोगोंसे वह सर्वार्थचिन्तक अधिकारी इस सारी प्रजाकी रक्षा करे ।। १२ १/२ ।।

विक्रयं क्रयमध्वानं भक्तं च सपरिच्छदम् ।। १३ ।।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य वणिजां कारयेत् करान् ।
राजाको मालकी खरीद—बिक्री, उसके मँगानेका खर्च, उसमें काम करनेवाले नौकरोंके वेतन, बचत और योग-क्षेमके निर्वाहकी ओर दृष्टि रखकर ही व्यापारियोंपर कर लगाना चाहिये ।। १३ १/२ ।।

उत्पत्तिं दानवृत्तिं च शिल्पं सम्प्रेक्ष्य चासकृत् ।। १४ ।।
शिल्पं प्रति करानेवं शिल्पिनः प्रति कारयेत् ।
इसी तरह मालकी तैयारी, उसकी खपत तथा शिल्पकी उत्तम-मध्यम आदि श्रेणियोंका बार-बार निरीक्षण करके शिल्प एवं शिल्पकारोंपर कर लगावे ।। १४ १/२ ।।

उच्चावचकरा दाप्या महाराज्ञा युधिष्ठिर ।। १५ ।।
यथा यथा न सीदेरंस्तथा कुर्यान्महीपतिः ।
फलं कर्म च सम्प्रेक्ष्य ततः सर्वं प्रकल्पयेत् ।। १६ ।।
युधिष्ठिर! महाराजको चाहिये कि वह लोगोंकी हैसियतके अनुसार भारी और हलका कर लगावे। भूपालको उतना ही कर लेना चाहिये, जितनेसे प्रजा संकटमें न पड़ जाय। उनका कार्य और लाभ देखकर ही सब कुछ करना चाहिये ।। १५-१६ ।।

फलं कर्म च निर्हेतु न कश्चित् सम्प्रवर्तते ।
यथा राजा च कर्ता च स्यातां कर्मणि भागिनौ ।। १७ ।।
संवेक्ष्य तु तथा राज्ञा प्रणेयाः सततं कराः ।
लाभ और कर्म दोनों ही यदि निष्प्रयोजन हुए तो कोई भी काम करनेमें प्रवृत्त नहीं होगा। अतः जिस उपायसे राजा और कार्यकर्ता दोनोंको कृषि, वाणिज्य आदि कर्मके लाभका भाग प्राप्त हो, उसपर विचार करके राजाको सदैव करोंका निर्णय करना चाहिये ।। १७ १/२ ।।

नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चापि तृष्णया ।। १८ ।।
ईहाद्वाराणि संरुध्य राजा सम्प्रीतदर्शनः ।
प्रद्विषन्ति परिख्यातं राजानमतिखादिनम् ।। १९ ।।
अधिक तृष्णाके कारण अपने जीवनके मूल आधार प्रजाओंके जीवनभूत खेती-बारी आदिका उच्छेद न कर डाले। राजा लोभके दरवाजोंको बंद करके ऐसा बने कि उसका