महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 611, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥ १४ ॥
लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की। उन्होंने सोचा था कि 'यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा' ॥ १४ ॥
यस्मिन् धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते ।
यस्मिन् विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥ १५ ॥
अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं और जिसमें धर्म (वृष) का लय हो गया हो, उसे देवतालोग 'वृषल' मानते हैं ॥ १५ ॥
वृषो हि भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥ १६ ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका। जो धर्मके विषयमें 'अलम्' (बस) कह देता है, उसे देवता 'वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥
धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा ।
तस्मिन् ह्रसति ह्रीयन्ते तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १७ ॥
धर्मकी वृद्धि होनेपर सदा समस्त प्राणियोंका अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होनेपर सबका ह्रास हो जाता है; अतः धर्मका कभी लोप नहीं होने देना चाहिये ॥ १७ ॥
धनात् स्रवति धर्मो हि धारणाद् वेति निश्चयः ।
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! धनसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। सबको धारण करनेके कारण वह निश्चितरूपसे धर्म कहा गया है। वह धर्म अकर्तव्य (पाप) की सीमाका अन्त करनेवाला माना गया है ॥ १८ ॥
प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा ।
तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥ १९ ॥
ब्रह्माजीने प्राणियोंके कल्याणार्थ ही धर्मकी सृष्टि की है, इसलिये राजाको चाहिये कि अपने देशमें प्रजा-जनोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका प्रचार करे ॥ १९ ॥
तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः ।
स राजा यः प्रजाः शास्ति साधुकृत् पुरुषर्षभ ॥ २० ॥
राजसिंह! इसी कारणसे धर्मको सबसे श्रेष्ठ माना गया है। पुरुषप्रवर! जो सद्धर्मके पालनपूर्वक प्रजाका शासन करता है, वही राजा है ॥ २० ॥
कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥ २१ ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो। धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ॥ २१ ॥