भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 617

दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प—इन सबकी दृष्टिको मैं अत्यन्त दुःसह मानता हूँ; इसलिये तुम किसी दुर्बल प्राणीको न सताना ॥ १४ ॥ दुर्बलांस्तात बुध्येथा नित्यमेवाविमानितान् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयुः सबान्धवम् ॥ १५ ॥ तात! तुम दुर्बल प्राणियोंको सदा ही अपमानका पात्र न समझना, दुर्बलोंकी आँखें तुम्हें बन्धु-बान्धवों-सहित जलाकर भस्म न कर डालें, इसके लिये सदा सावधान रहना ॥ १५ ॥ न हि दुर्बलदग्धस्य कुले किंचित् प्ररोहति । आमूलं निर्दहन्त्येव मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १६ ॥ दुर्बल मनुष्य जिसको अपनी क्रोधाग्निसे जला डालते हैं, उसके कुलमें फिर कोई अंकुर नहीं जमता। वे जड़मूलसहित दग्ध कर देते हैं; अतः तुम दुर्बलोंको कभी न सताना ॥ १६ ॥ अबलं वै बलाच्छ्रेयो यच्चातिबलवद्वलम् । बलस्याबलदग्धस्य न किंचिदवशिष्यते ॥ १७ ॥ निर्बल प्राणी बलवान्‌से श्रेष्ठ है, क्योंकि जो अत्यन्त बलवान् है, उसके बलसे भी निर्बलका बल अधिक है। निर्बलके द्वारा दग्ध किये गये बलवान्‌का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ॥ १७ ॥ विमानितो हतः क्रुष्टस्त्रातारं चेन्न विन्दति । अमानुषकृतस्तत्र दण्डो हन्ति नराधिपम् ॥ १८ ॥ यदि अपमानित, हताहत तथा गाली-गलौजसे तिरस्कृत होनेवाला दुर्बल मनुष्य राजाको अपने रक्षकके रूपमें नहीं उपलब्ध कर पाता तो वहाँ दैवका दिया हुआ दण्ड राजाको मार डालता है ॥ १८ ॥ मा स्म तात रणे स्थित्वा भुञ्जीथा दुर्बलं जनम् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि दहन्त्वग्निरिवाश्रयम् ॥ १९ ॥ तात! तुम युद्धमें संलग्न होकर दुर्बल मनुष्यको कर लेनेके द्वारा अपने उपभोगका विषय न बनाना। जैसे आग अपने आश्रयभूत काष्ठको जला देती है, उसी प्रकार दुर्बलोंकी दृष्टि तुम्हें दग्ध न कर डाले ॥ १९ ॥ यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदताम् । तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसनात् ॥ २० ॥ झूठे अपराध लगाये जानेपर रोते हुए दीन-दुर्बल मनुष्योंके नेत्रोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे मिथ्या कलंक लगानेके कारण उन अपराधियोंके पुत्रों और पशुओंका नाश कर डालते हैं ॥ २० ॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पौत्रेषु नप्तृषु । न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ॥ २१ ॥