भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 618, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 618

यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती-पोतोंको अवश्य मिलता है। जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता (समय आनेपर ही उसका फल मिलता है) ॥ २१ ॥ यत्राबलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति । महान् दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ॥ २२ ॥ सताया जानेवाला दुर्बल मनुष्य जहाँ अपने लिये कोई रक्षक नहीं पाता है, वहाँ सतानेवाले पापीको दैवकी ओरसे भयंकर दण्ड प्राप्त होता है ॥ २२ ॥ युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते ब्राह्मणा इव । अभीक्ष्णं भिक्षुरूपेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ॥ २३ ॥ जब बाहर गावोंके लोग एक समूह बनाकर भिक्षुकरूपसे ब्राह्मणोंके समान भिक्षा माँगने लगते हैं, तब वैसे लोग एक दिन राजाका विनाश कर डालते हैं ॥ २३ ॥ राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषाः । अनयेनोपवर्तन्ते तद् राज्ञः किल्बिषं महत् ॥ २४ ॥ जब राजाके बहुत-से कर्मचारी देशमें अन्यायपूर्ण बर्ताव करने लगते हैं, तब वह महान् पाप राजाको ही लगता है ॥ २४ ॥ यदा युक्त्या नयेदर्थान् कामादर्थवशेन वा । कृपणं याचमानानां तद् राज्ञो वैशसं महत् ॥ २५ ॥ यदि कोई राजा या राजकीय कर्मचारी दीनतापूर्ण याचना करती हुई प्रजाओंकी उस प्रार्थनाको ठुकराकर स्वेच्छासे अथवा धनके लोभवश कोई-न-कोई युक्ति करके उनके धनका अपहरण कर ले तो वह राजाके महान् विनाशका सूचक है ॥ २५ ॥ महान् वृक्षो जायते वर्धते च तं चैव भूतानि समाश्रयन्ति । यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते च तदाश्रया अनिकेता भवन्ति ॥ २६ ॥ जब कोई महान् वृक्ष पैदा होता और क्रमशः बढ़ता है, तब बहुत-से प्राणी (पक्षी) आकर उसपर बसेरे लेते हैं और जब उस वृक्षको काटा या जला दिया जाता है, तब उसपर रहनेवाले सभी जीव निराश्रय हो जाते हैं ॥ २६ ॥ यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति संस्कारं वा राजगुणं ब्रुवाणाः । तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहात् तूर्णं जह्यात् सुकृतं दुष्कृतं च ॥ २७ ॥ जब राज्यमें रहनेवाले लोग राजाके गुणोंका बखान करते हुए वैदिक संस्कारोंके साथ उत्तम धर्मका आचरण करते हैं, उस समय राजा पापमुक्त हो जाता है तथा जब वे ही लोग