भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 619

धर्मके विषयमें मोहित हो जानेके कारण अधर्माचरण करने लगते हैं, उस समय राजा शीघ्र ही पुण्यसे हीन हो जाता है ।। २७ ।। यत्र पापा ज्ञायमानाश्चरन्ति सतां कलिर्विन्दते तत्र राज्ञः । यदा राजा शास्ति नरानशिष्टां- स्तदा राज्यं वर्धते भूमिपस्य ।। २८ ।। जहाँ पापी मनुष्य प्रकटरूपसे निर्भय विचरते हैं, वहाँ सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें समझा जाता है कि राजाको कलियुगने घेर लिया है; किंतु जब राजा दुष्ट मनुष्योंको दण्ड देता है, तब उसका राज्य सब ओरसे उन्नत होने लगता है ।। २८ ।। यश्चामात्यान् मानयित्वा यथार्थं मन्त्रे च युद्धे च नृपो नियुञ्ज्यात् । विवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय ।। २९ ।। जो राजा अपने मन्त्रियोंका यथार्थरूपसे सम्मान करके उन्हें मन्त्रणा अथवा युद्धके काममें नियुक्त करता है, उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता है और वह चिरकालतक समूची पृथ्वीका राज्य भोगता है ।। २९ ।। यच्चापि सुकृतं कर्म वाचं चैव सुभाषिताम् । समीक्ष्य पूजयन् राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।। ३० ।। जो राजा अपने कर्मचारी अथवा प्रजाका पुण्यकर्म देखकर तथा उनकी सुन्दर वाणी सुनकर उन सबका यथायोग्य सम्मान करता है, वह परम उत्तम धर्मको प्राप्त कर लेता है ।। ३० ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नामात्यानवमन्यते । निहन्ति बलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३१ ।। राजा जब उसको यथायोग्य विभाग देकर स्वयं उपभोग करता है, मन्त्रियोंका अनादर नहीं करता है और बलके घमंडमें चूर रहनेवाले दुष्ट पुरुष या शत्रुको मार डालता है, तब उसका यह सब कार्य राजधर्म कहलाता है ।। ३१ ।। त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा । पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३२ ।। जब वह मन, वाणी और शरीरके द्वारा सबकी रक्षा करता है और पुत्रके भी अपराधको क्षमा नहीं करता, तब उसका वह बर्ताव भी 'राजाका धर्म' कहा जाता है ।। ३२ ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिर्दुर्बलान् नरान् । तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३३ ।।