भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 620

जब राजा दुर्बल मनुष्योंको यथावश्यक वस्तुएँ देकर पीछे स्वयं भोजन करता है, तब वे दुर्बल मनुष्य बलवान् हो जाते हैं। वह त्याग राजाका धर्म कहा गया है ।। ३३ ।।

यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति । यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३४ ।। जब राजा समूचे राष्ट्रकी रक्षा करता है, डाकू और लुटेरोंको मार भगाता है तथा संग्राममें विजयी होता है, तब वह सब राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३४ ।।

पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा । प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३५ ।। प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति भी यदि क्रिया अथवा वाणीद्वारा पाप करे तो राजाको चाहिये कि उसे भी क्षमा न करे अर्थात् उसे भी यथायोग्य दण्ड दे। जो ऐसा बर्ताव है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ३५ ।।

यदा शारणिकान् राजा पुत्रवत् परिरक्षति । भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३६ ।। जब राजा व्यापारियोंकी पुत्रके समान रक्षा करता है और धर्मकी मर्यादाको भंग नहीं करता, तब वह भी राजाका धर्म कहलाता है ।। ३६ ।।

यदाऽऽप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वितः । कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३७ ।। जब वह राग और द्वेषका अनादर करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक यजन करता है, तब वह राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३७ ।।

कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु परिमार्जति । हर्षं संजनयन् नृणां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३८ ।। जब वह दीन, अनाथ और वृद्धोंके आँसू पोंछता है और इस बर्तावद्वारा सब लोगोंके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करता है, तब उसका वह सद्भाव राजाका धर्म कहलाता है ।। ३८ ।।

विवर्धयति मित्राणि तथारींश्चापि कर्षति । सम्पूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३९ ।। वह जो मित्रोंकी वृद्धि, शत्रुओंका नाश और साधु पुरुषोंका समादर करता है, उसे राजाका धर्म कहते हैं ।। ३९ ।।

सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमिं प्रयच्छति । पूजयेदतिथीन् भृत्यान् स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ४० ।। राजा जो प्रेमपूर्वक सत्यका पालन करता है, प्रतिदिन भूदान देता है और अतिथियों तथा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका सत्कार करता है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ४० ।।

निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ ।

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