महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअस्मिन् लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् ॥ ४१ ॥
जिसमें निग्रह¹ और अनुग्रह² दोनों प्रतिष्ठित हों, वह राजा इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल पाता है ॥ ४१ ॥
यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः ।
संयच्छन् भवति प्राणानसंयच्छंस्तु पातकः ॥ ४२ ॥
मान्धाता! राजा दुष्टोंको दण्ड देनेके कारण यम तथा धार्मिकोंपर अनुग्रह करनेके कारण उनके लिये परमेश्वरके समान है। जब वह अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखता है, तब शासनमें समर्थ होता है और जब संयममें नहीं रखता, तब मर्यादासे नीचे गिर जाता है ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृत्यानवमन्य च ।
यदा सम्यक् प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ४३ ॥
जब राजा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यका बिना अवहेलनाके सत्कार करके उनको उचित बर्तावके साथ अपनाता है, तब वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ४३ ॥
यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः ।
तथा राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत् प्रजाः ॥ ४४ ॥
जैसे यमराज सभी प्राणियोंपर समानरूपसे शासन करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी बिना किसी भेदभावके समस्त प्रजाओंपर विधिपूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिये ॥ ४४ ॥
सहस्राक्षेण राजा हि सर्वथैवोपमीयते ।
स पश्यति च यं धर्मं स धर्मः पुरुषर्षभ ॥ ४५ ॥
पुरुषप्रवर! राजाकी उपमा सब प्रकारसे हजार नेत्रोंवाले इन्द्रसे दी जाती है; अतः राजा जिस धर्मको भलीभाँति समझकर निश्चित कर देता है वही श्रेष्ठ धर्म माना गया है ॥ ४५ ॥
अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां बुद्धिं धृतिं मतिम् ।
भूतानां चैव जिज्ञासा साध्वसाधु च सर्वदा ॥ ४६ ॥
राजन्! तुम सावधान होकर क्षमा, विवेक, धृति और बुद्धिकी शिक्षा ग्रहण करो। समस्त प्राणियोंकी शक्ति तथा भलाई-बुराईको भी सदा जाननेकी इच्छा करो ॥
संग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरं वचः ।
पौरजानपदांश्चैव गोप्तव्यास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥
समस्त प्राणियोंको अपने अनुकूल बनाये रखना, दान देना और मीठे वचन बोलना सीखो। नगर और बाहर गाँववाले लोगोंकी तुम्हें इस प्रकार रक्षा करनी चाहिये, जिससे उन्हें सुख मिले ॥ ४७ ॥
न जात्वदक्षो नृपतिः प्रजाः शक्नोति रक्षितुम् ।
भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥
तात! जो दक्ष नहीं है, वह राजा कभी प्रजाकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि यह राज्यका संचालनरूप अत्यंत दुष्कर कार्य बहुत बड़ा भार है ॥ ४८ ॥