भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती-पोतोंको अवश्य मिलता है। जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता (समय आनेपर ही उसका फल मिलता है) ॥ २१ ॥ यत्राबलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति । महान् दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ॥ २२ ॥ सताया जानेवाला दुर्बल मनुष्य जहाँ अपने लिये कोई रक्षक नहीं पाता है, वहाँ सतानेवाले पापीको दैवकी ओरसे भयंकर दण्ड प्राप्त होता है ॥ २२ ॥ युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते ब्राह्मणा इव । अभीक्ष्णं भिक्षुरूपेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ॥ २३ ॥ जब बाहर गावोंके लोग एक समूह बनाकर भिक्षुकरूपसे ब्राह्मणोंके समान भिक्षा माँगने लगते हैं, तब वैसे लोग एक दिन राजाका विनाश कर डालते हैं ॥ २३ ॥ राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषाः । अनयेनोपवर्तन्ते तद् राज्ञः किल्बिषं महत् ॥ २४ ॥ जब राजाके बहुत-से कर्मचारी देशमें अन्यायपूर्ण बर्ताव करने लगते हैं, तब वह महान् पाप राजाको ही लगता है ॥ २४ ॥ यदा युक्त्या नयेदर्थान् कामादर्थवशेन वा । कृपणं याचमानानां तद् राज्ञो वैशसं महत् ॥ २५ ॥ यदि कोई राजा या राजकीय कर्मचारी दीनतापूर्ण याचना करती हुई प्रजाओंकी उस प्रार्थनाको ठुकराकर स्वेच्छासे अथवा धनके लोभवश कोई-न-कोई युक्ति करके उनके धनका अपहरण कर ले तो वह राजाके महान् विनाशका सूचक है ॥ २५ ॥ महान् वृक्षो जायते वर्धते च तं चैव भूतानि समाश्रयन्ति । यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते च तदाश्रया अनिकेता भवन्ति ॥ २६ ॥ जब कोई महान् वृक्ष पैदा होता और क्रमशः बढ़ता है, तब बहुत-से प्राणी (पक्षी) आकर उसपर बसेरे लेते हैं और जब उस वृक्षको काटा या जला दिया जाता है, तब उसपर रहनेवाले सभी जीव निराश्रय हो जाते हैं ॥ २६ ॥ यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति संस्कारं वा राजगुणं ब्रुवाणाः । तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहात् तूर्णं जह्यात् सुकृतं दुष्कृतं च ॥ २७ ॥ जब राज्यमें रहनेवाले लोग राजाके गुणोंका बखान करते हुए वैदिक संस्कारोंके साथ उत्तम धर्मका आचरण करते हैं, उस समय राजा पापमुक्त हो जाता है तथा जब वे ही लोग

धर्मके विषयमें मोहित हो जानेके कारण अधर्माचरण करने लगते हैं, उस समय राजा शीघ्र ही पुण्यसे हीन हो जाता है ।। २७ ।। यत्र पापा ज्ञायमानाश्चरन्ति सतां कलिर्विन्दते तत्र राज्ञः । यदा राजा शास्ति नरानशिष्टां- स्तदा राज्यं वर्धते भूमिपस्य ।। २८ ।। जहाँ पापी मनुष्य प्रकटरूपसे निर्भय विचरते हैं, वहाँ सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें समझा जाता है कि राजाको कलियुगने घेर लिया है; किंतु जब राजा दुष्ट मनुष्योंको दण्ड देता है, तब उसका राज्य सब ओरसे उन्नत होने लगता है ।। २८ ।। यश्चामात्यान् मानयित्वा यथार्थं मन्त्रे च युद्धे च नृपो नियुञ्ज्यात् । विवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय ।। २९ ।। जो राजा अपने मन्त्रियोंका यथार्थरूपसे सम्मान करके उन्हें मन्त्रणा अथवा युद्धके काममें नियुक्त करता है, उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता है और वह चिरकालतक समूची पृथ्वीका राज्य भोगता है ।। २९ ।। यच्चापि सुकृतं कर्म वाचं चैव सुभाषिताम् । समीक्ष्य पूजयन् राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।। ३० ।। जो राजा अपने कर्मचारी अथवा प्रजाका पुण्यकर्म देखकर तथा उनकी सुन्दर वाणी सुनकर उन सबका यथायोग्य सम्मान करता है, वह परम उत्तम धर्मको प्राप्त कर लेता है ।। ३० ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नामात्यानवमन्यते । निहन्ति बलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३१ ।। राजा जब उसको यथायोग्य विभाग देकर स्वयं उपभोग करता है, मन्त्रियोंका अनादर नहीं करता है और बलके घमंडमें चूर रहनेवाले दुष्ट पुरुष या शत्रुको मार डालता है, तब उसका यह सब कार्य राजधर्म कहलाता है ।। ३१ ।। त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा । पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३२ ।। जब वह मन, वाणी और शरीरके द्वारा सबकी रक्षा करता है और पुत्रके भी अपराधको क्षमा नहीं करता, तब उसका वह बर्ताव भी 'राजाका धर्म' कहा जाता है ।। ३२ ।। संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिर्दुर्बलान् नरान् । तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३३ ।।

जब राजा दुर्बल मनुष्योंको यथावश्यक वस्तुएँ देकर पीछे स्वयं भोजन करता है, तब वे दुर्बल मनुष्य बलवान् हो जाते हैं। वह त्याग राजाका धर्म कहा गया है ।। ३३ ।।

यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति । यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३४ ।। जब राजा समूचे राष्ट्रकी रक्षा करता है, डाकू और लुटेरोंको मार भगाता है तथा संग्राममें विजयी होता है, तब वह सब राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३४ ।।

पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा । प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३५ ।। प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति भी यदि क्रिया अथवा वाणीद्वारा पाप करे तो राजाको चाहिये कि उसे भी क्षमा न करे अर्थात् उसे भी यथायोग्य दण्ड दे। जो ऐसा बर्ताव है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ३५ ।।

यदा शारणिकान् राजा पुत्रवत् परिरक्षति । भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३६ ।। जब राजा व्यापारियोंकी पुत्रके समान रक्षा करता है और धर्मकी मर्यादाको भंग नहीं करता, तब वह भी राजाका धर्म कहलाता है ।। ३६ ।।

यदाऽऽप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वितः । कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३७ ।। जब वह राग और द्वेषका अनादर करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक यजन करता है, तब वह राजाका धर्म कहा जाता है ।। ३७ ।।

कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु परिमार्जति । हर्षं संजनयन् नृणां स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३८ ।। जब वह दीन, अनाथ और वृद्धोंके आँसू पोंछता है और इस बर्तावद्वारा सब लोगोंके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करता है, तब उसका वह सद्भाव राजाका धर्म कहलाता है ।। ३८ ।।

विवर्धयति मित्राणि तथारींश्चापि कर्षति । सम्पूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ३९ ।। वह जो मित्रोंकी वृद्धि, शत्रुओंका नाश और साधु पुरुषोंका समादर करता है, उसे राजाका धर्म कहते हैं ।। ३९ ।।

सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमिं प्रयच्छति । पूजयेदतिथीन् भृत्यान् स राज्ञो धर्म उच्यते ।। ४० ।। राजा जो प्रेमपूर्वक सत्यका पालन करता है, प्रतिदिन भूदान देता है और अतिथियों तथा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका सत्कार करता है, वह राजाका धर्म कहलाता है ।। ४० ।।

निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ ।

अस्मिन् लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् ॥ ४१ ॥
जिसमें निग्रह¹ और अनुग्रह² दोनों प्रतिष्ठित हों, वह राजा इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल पाता है ॥ ४१ ॥

यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः ।
संयच्छन् भवति प्राणानसंयच्छंस्तु पातकः ॥ ४२ ॥
मान्धाता! राजा दुष्टोंको दण्ड देनेके कारण यम तथा धार्मिकोंपर अनुग्रह करनेके कारण उनके लिये परमेश्वरके समान है। जब वह अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखता है, तब शासनमें समर्थ होता है और जब संयममें नहीं रखता, तब मर्यादासे नीचे गिर जाता है ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृत्यानवमन्य च ।
यदा सम्यक् प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ४३ ॥
जब राजा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यका बिना अवहेलनाके सत्कार करके उनको उचित बर्तावके साथ अपनाता है, तब वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ४३ ॥

यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः ।
तथा राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत् प्रजाः ॥ ४४ ॥
जैसे यमराज सभी प्राणियोंपर समानरूपसे शासन करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी बिना किसी भेदभावके समस्त प्रजाओंपर विधिपूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिये ॥ ४४ ॥

सहस्राक्षेण राजा हि सर्वथैवोपमीयते ।
स पश्यति च यं धर्मं स धर्मः पुरुषर्षभ ॥ ४५ ॥
पुरुषप्रवर! राजाकी उपमा सब प्रकारसे हजार नेत्रोंवाले इन्द्रसे दी जाती है; अतः राजा जिस धर्मको भलीभाँति समझकर निश्चित कर देता है वही श्रेष्ठ धर्म माना गया है ॥ ४५ ॥

अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां बुद्धिं धृतिं मतिम् ।
भूतानां चैव जिज्ञासा साध्वसाधु च सर्वदा ॥ ४६ ॥
राजन्! तुम सावधान होकर क्षमा, विवेक, धृति और बुद्धिकी शिक्षा ग्रहण करो। समस्त प्राणियोंकी शक्ति तथा भलाई-बुराईको भी सदा जाननेकी इच्छा करो ॥

संग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरं वचः ।
पौरजानपदांश्चैव गोप्तव्यास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥
समस्त प्राणियोंको अपने अनुकूल बनाये रखना, दान देना और मीठे वचन बोलना सीखो। नगर और बाहर गाँववाले लोगोंकी तुम्हें इस प्रकार रक्षा करनी चाहिये, जिससे उन्हें सुख मिले ॥ ४७ ॥

न जात्वदक्षो नृपतिः प्रजाः शक्नोति रक्षितुम् ।
भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥
तात! जो दक्ष नहीं है, वह राजा कभी प्रजाकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि यह राज्यका संचालनरूप अत्यंत दुष्कर कार्य बहुत बड़ा भार है ॥ ४८ ॥

तद्दण्डविन्नृपः प्राज्ञः शूरः शक्नोति रक्षितुम् । न हि शक्यमदण्डेन क्लीबेनाबुद्धिनापि वा ॥ ४९ ॥ राज्यकी रक्षा तो वही राजा कर सकता है, जो बुद्धिमान् और शूरवीर होनेके साथ ही दण्ड देनेकी नीतिको भी जानता हो। जो दण्ड देनेसे हिचकता हो, वह नपुंसक और बुद्धिहीन नरेश कदापि राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता ॥ ४९ ॥

अभिरूपैः कुले जातैर्दक्षैर्भक्तैर्बहुश्रुतैः । सर्वा बुद्धीः परीक्षेतस्तापसाश्रमिणामपि ॥ ५० ॥ तुम्हें रूपवान्, कुलीन, कार्यदक्ष, राजभक्त एवं बहुज्ञ मन्त्रियोंके साथ रहकर तापसों और आश्रम-वासियोंकी भी सम्पूर्ण बुद्धियों (सारे विचारों) की परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५० ॥

अतस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् । स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनङ्क्ष्यति ॥ ५१ ॥ ऐसा करनेसे तुमको सम्पूर्ण भूतोंके परम धर्मका ज्ञान हो जायगा; फिर स्वदेशमें रहो या परदेशमें, कहीं भी तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होगा ॥ ५१ ॥

तस्मादर्थाच्च कामाच्च धर्म एवोत्तरो भवेत् । अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते ॥ ५२ ॥ इस तरह विचार करनेसे अर्थ और कामकी अपेक्षा धर्म ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। धर्मात्मा पुरुष इहलोकमें और परलोकमें भी सुख भोगता है ॥ ५२ ॥

त्यजन्ति दारान् पुत्रांश्च मनुष्याः परिपूजिताः । संग्रहश्चैव भूतानां दानं च मधुरा च वाक् ॥ ५३ ॥ अप्रमादश्च शौचं च राज्ञो भूतिकरं महत् । एतेभ्यश्चैव मान्धातः सततं मा प्रमादिथाः ॥ ५४ ॥ यदि मनुष्योंका सम्मान किया जाय तो वे सम्मान-दाताके हितके लिये अपने पुत्रों और स्त्रियोंको भी छोड़ देते हैं। समस्त प्राणियोंको अपने पक्षमें मिलाये रखना, दान देना, मीठे वचन बोलना, प्रमादका त्याग करना तथा बाहर और भीतरसे पवित्र रहना—ये राजाका ऐश्वर्य बढ़ानेवाले बहुत बड़े साधन हैं। मान्धाता! तुम इन सब बातोंकी ओरसे कभी प्रमाद न करना ॥

अप्रमत्तो भवेद् राजा छिद्रदर्शी परात्मनोः । नास्यच्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमान्वियात् ॥ ५५ ॥ राजाको सदा सावधान रहना चाहिये। वह शत्रु का तथा अपना भी छिद्र देखे और यह प्रयत्न करे कि शत्रु मेरा छिद्र अच्छी तरह न देखने पाये; परंतु यदि शत्रुके छिद्रों (दुर्बलताओं) का पता लग जाय तो वह उसपर चढ़ाई कर दे ॥ ५५ ॥

एतद् वृत्तं वासवस्य यमस्य वरुणस्य च ।

राजर्षीणां च सर्वेषां तत् त्वमप्यनुपालय ।। ५६ ।।
इन्द्र, यम, वरुण तथा सम्पूर्ण राजर्षियोंका यही बर्ताव है, तुम भी इसका निरन्तर पालन करो ।। ५६ ।।
तत् कुरुष्व महाराज वृत्तं राजर्षिसेवितम् ।
आतिष्ठ दिव्यं पन्थानमह्नाय पुरुषर्षभ ।। ५७ ।।
पुरुषप्रवर महाराज! राजर्षियोंद्वारा सेवित उस आचारका तुम पालन करो और शीघ्र ही प्रकाशयुक्त दिव्य मार्गका आश्रय लो ।। ५७ ।।
धर्मवृत्तं हि राजानं प्रेत्य चेह च भारत ।
देवर्षिपितृगन्धर्वाः कीर्तयन्ति महौजसः ।। ५८ ।।
भारत!* महातेजस्वी देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व इहलोक और परलोकमें भी धर्मपरायण राजाके यशका गान करते रहते हैं ।। ५८ ।।

भीष्म उवाच

स एवमुक्तो मान्धाता तेनोतथ्येन भारत ।
कृतवानविशङ्कश्च एकः प्राप च मेदिनीम् ।। ५९ ।।
भीष्मजी कहते हैं—भरतनन्दन! उतथ्यके इस प्रकार उपदेश देनेपर मान्धाताने निःशंक होकर उनकी आज्ञाका पालन किया और सारी पृथ्वीका एकछत्र राज्य पा लिया ।। ५९ ।।
भवानपि तथा सम्यङ्मान्धातेव महीपते ।
धर्मं कृत्वा महीं रक्ष स्वर्गे स्थानमवाप्स्यसि ।। ६० ।।
पृथ्वीनाथ! मान्धाताकी ही भाँति तुम भी अच्छी तरह धर्मका पालन करते हुए इस पृथ्वीकी रक्षा करो; फिर तुम भी स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लोगे ।। ६० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु
एकनवतितमोऽध्यायः ।। ९१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९१ ।।


१. दुष्टोंको दण्ड देनेका स्वभाव।
२. दीन-दुखियों तथा साधु पुरुषोंके प्रति दया एवं सहानुभूति।
* उतथ्यने राजा मान्धाताको उपदेश दिया है और मान्धाता सूर्यवंशी नरेश थे, इसलिये उनके उद्देश्यसे 'भारत' सम्बोधन पद यद्यपि उचित नहीं है तथापि यह प्रसंग भीष्मजी युधिष्ठिरको सुनाते हैं; अतः यह समझना चाहिये कि युधिष्ठिरके उद्देश्यसे उन्होंने यहाँ 'भारत' विशेषणका प्रयोग किया है।

राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश

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द्विनवतितमोऽध्यायः

राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् राजा वर्तेत धार्मिकः ।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुश्रेष्ठ पितामह! धर्मात्मा राजा यदि धर्ममें स्थित रहना चाहे तो उसे किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये? यह मैं आपसे पूछता हूँ; आप मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें लोग तत्त्वज्ञानी महात्मा वामदेवजीद्वारा दिये हुए उपदेशरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

राजा वसुमना नाम ज्ञानवान् धृतिमान् शुचिः ।
महर्षिं परिपप्रच्छ वामदेवं तपस्विनम् ॥ ३ ॥
वसुमना नामक एक प्रसिद्ध राजा हो गये हैं, जो ज्ञानवान्, धैर्यवान् और पवित्र आचार-विचारवाले थे। उन्होंने एक दिन तपस्वी महर्षि वामदेवजीसे पूछा— ॥

धर्मार्थसहितैर्वाक्यैर्भगवन्ननुशाधि माम् ।
येन वृत्तेन वै तिष्ठन् न हीयेयं स्वधर्मतः ॥ ४ ॥
‘भगवन्! मैं किस बर्तावका पालन करता रहूँ, जिससे अपने धर्मसे कभी न गिरूँ। आप अपने अर्थ और धर्मयुक्त वचनोंद्वारा मुझे इसी बातका उपदेश दीजिये’ ॥ ४ ॥

तमब्रवीद् वामदेवस्तेजस्वी तपतां वरः ।
हेमवर्णं सुखासीनं ययातिमिव नाहुषम् ॥ ५ ॥
तब तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी महर्षि वामदेवने नहुषपुत्र ययातिके समान सुखपूर्वक बैठे हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले राजा वसुमनासे कहा ॥ ५ ॥

वामदेव उवाच

धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद् विद्यते परम् ।
धर्मे स्थिता हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ॥ ६ ॥
वामदेवजी बोले— राजन्! तुम धर्मका ही अनुसरण करो। धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि धर्ममें स्थित रहनेवाले राजा इस सारी पृथ्‍वीको जीत लेते हैं ॥ ६ ॥

अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः । वृद्ध्यां च कुरुते बुद्धिं स धर्मेण विराजते ॥ ७ ॥ जो भूपाल धर्मको अर्थ-सिद्धिकी अपेक्षा भी बड़ा मानता है और उसीको बढ़ानेमें अपने मन और बुद्धिका उपयोग करता है, वह धर्मके कारण बड़ी शोभा पाता है ॥ ७ ॥

अधर्मदर्शी यो राजा बलादेव प्रवर्तते । क्षिप्रमेवापयातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ॥ ८ ॥ इसके विपरीत जो राजा अधर्मपर ही दृष्टि रखकर बलपूर्वक उसमें प्रवृत्त होता है, उसे धर्म और अर्थ दोनों पुरुषार्थ शीघ्र छोड़कर चल देते हैं ॥ ८ ॥

असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा । सहैव परिवारेण क्षिप्रमेवावसीदति ॥ ९ ॥ जो दुष्ट एवं पापिष्ठ मन्त्रियोंकी सहायतासे धर्मको हानि पहुँचाता है, वह सब लोगोंका वध्य हो जाता है और अपने परिवारके साथ ही शीघ्र संकटमें पड़ जाता है ॥

अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः । अपि सर्वां महीं लब्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १० ॥ जो राजा अर्थ-सिद्धिकी चेष्टा नहीं करता और स्वेच्छाचारी हो बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, वह सारी पृथ्वीका राज्य पाकर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥

अथाददानः कल्याणमनसूयुर्जितेन्द्रियः । वर्धते मतिमान् राजा स्रोतोभिरिव सागरः ॥ ११ ॥ परंतु जो कल्याणकारी गुणोंको ग्रहण करनेवाला, अनिन्दक, जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् होता है, वह राजा उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होता है, जैसे नदियोंके प्रवाहसे समुद्र ॥ ११ ॥

न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः । बुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ॥ १२ ॥ राजाको चाहिये कि वह सदा धर्म, अर्थ, काम, बुद्धि और मित्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी कभी अपनेको पूर्ण न माने—सदा उन सबके संग्रहको बढ़ानेकी ही चेष्टा करे ॥ १२ ॥

एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकयात्रा प्रतिष्ठिता । एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्तिं श्रियं प्रजाः ॥ १३ ॥ राजाकी जीवनयात्रा इन्हीं सबोंपर अवलम्बित है। इन सबको सुनने और ग्रहण करनेसे राजाको यश, कीर्ति, लक्ष्मी और प्रजाकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः । अर्थान् समीक्ष्य भजते स ध्रुवं महदश्नुते ॥ १४ ॥ जो इस प्रकार धर्मके प्रति आग्रह रखनेवाला एवं धर्म और अर्थका चिन्तन करनेवाला है तथा अर्थपर भलीभाँति विचार करके उसका सेवन करता है, वह निश्चय ही महान्

फलका भागी होता है ॥ १४ ॥
अदाता ह्यनतिस्नेहो दण्डेनावर्तयन् प्रजाः ।
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १५ ॥
जो दुःसाहसी, दान न देनेवाला और स्नेहशून्य तथा दण्डके द्वारा प्रजाको बार-बार सताता है, वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥
अथ पापकृतं बुद्ध्या न च पश्यत्यबुद्धिमान् ।
अकीर्त्याभिसमायुक्तो भूयो नरकमश्रुते ॥ १६ ॥
जो बुद्धिहीन राजा पाप करके भी अपनी बुद्धिके द्वारा अपनेको पापी नहीं समझता, वह इस लोकमें अपकीर्तिसे कलंकित हो परलोकमें नरकका भागी होता है ॥ १६ ॥
अथ मानयितुर्दान्मः श्लक्ष्णस्य वशवर्तिनः ।
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः ॥ १७ ॥
जो सबका मान करनेवाला, दानी, स्नेहयुक्त तथा दूसरोंके वशवर्ती होकर रहता है, उसपर यदि कोई संकट आ जाय तो सब लोग उसे अपना ही संकट मानकर उसको मिटानेकी चेष्टा करते हैं ॥ १७ ॥
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति ।
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्रुते ॥ १८ ॥
जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है ॥ १८ ॥
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्रुते ॥ १९ ॥
जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु
द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवजीकी गीताविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥

वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन

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त्रिनवतितमोऽध्यायः

वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन

वामदेव उवाच

यत्राधर्मं प्रणयते दुर्बले बलवत्तरः ।
तां वृत्तिमुपजीवन्ति ये भवन्ति तदन्वयाः ॥ १ ॥
**वामदेवजी कहते हैं—**राजन्! जिस राज्यमें अत्यन्त बलवान् राजा दुर्बल प्रजापर अधर्म या अत्याचार करने लगता है, वहाँ उसके अनुचर भी उसी बर्तावको अपनी जीविकाका साधन बना लेते हैं ॥ १ ॥

राजानमनुवर्तन्ते तं पापाभिप्रवर्तकम् ।
अविनीतमनुष्यं तत् क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ॥ २ ॥
वे उस पापप्रवर्तक राजाका ही अनुसरण करते हैं; अतः उद्दण्ड मनुष्योंसे भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥

यद् वृत्तमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवाः ।
तदेव विषमस्थस्य स्वजनोऽपि न मृष्यते ॥ ३ ॥
अच्छी अवस्थामें रहनेपर मनुष्यके जिस बर्तावका दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, संकटमें पड़ जानेपर उसी मनुष्यके उसी बर्तावको उसके स्वजन भी नहीं सहन करते हैं ॥ ३ ॥

साहसप्रकृतिर्यत्र किंचिदुल्बणमाचरेत् ।
अशास्त्रलक्षणो राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ४ ॥
दुःसाहसी प्रकृतिवाला जो राजा जहाँ कुछ उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करता है, वहाँ शास्त्रोक्त मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥

योऽत्यन्ताचरितां वृत्तिं क्षत्रियो नानुवर्तते ।
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ५ ॥
जो क्षत्रिय राज्यमें रहनेवाले विजित या अविजित मनुष्योंकी अत्यन्त आचरणमें लायी हुई वृत्तिका अनुवर्तन नहीं करता (अर्थात् उन लोगोंको अपने परम्परागत आचार-विचारका पालन नहीं करने देता) वह क्षत्रिय-धर्मसे गिर जाता है ॥ ५ ॥

द्विषन्तं कृतकल्याणं गृहीत्वा नृपतिं रणे ।
यो न मानयते द्वेषात् क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ६ ॥
यदि कोई राजा पहलेका उपकारी हो और किसी कारणवश वर्तमानकालमें द्वेष करने लगा हो तो उस समय जो भूपाल उसे युद्धमें बंदी बनाकर द्वेषवश उसका सम्मान नहीं करता, वह भी क्षत्रियधर्मसे गिर जाता है ॥

शक्तः स्यात् सुसुखो राजा कुर्यात् करणमापदि ।

प्रियो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥

राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुखका अनुभव करे और करावे तथा आपत्तिमें पड़

जाय तो उसके निवारणका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे वह सब प्राणियोंका प्रिय होता है और

कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।।

अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् ।

नचिरेण प्रियः स स्याद् योऽप्रियः प्रियमाचरेत् ॥ ८ ॥

राजाको चाहिये कि यदि किसीका अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे। इस

प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समयमें वह प्रिय हो जाता

है ।। ८ ।।

मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।

न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥ ९ ॥

मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे।

किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ।। ९ ।।

(अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद् बुधः ।

दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥)

नापत्रपेत प्रश्नेषु नाविभाव्यां गिरं सृजेत् ।

न त्वरेत न चासूयेत् तथा संगृह्यते परः ॥ १० ॥

विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे। सत्यको कभी न छोड़े। इन्द्रिय-संयम,

धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजाके हितका कभी परित्याग न करे। यदि कोई

कुछ पूछे तो उसका उत्तर देनेमें संकोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँहसे न निकाले,

किसी काममें जल्दबाजी न करे और किसीकी निन्दा न करे, ऐसा बर्ताव करनेसे शत्रु भी

अपने वशमें हो जाता है ।। १० ।।

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।

न तप्येदर्धकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ॥ ११ ॥

यदि अपना प्रिय हो जाय तो बहुत प्रसन्न न हो और अप्रिय हो जाय तो अत्यन्त चिन्ता

न करे। यदि आर्थिक संकट आ पड़े तो प्रजाके हितका चिन्तन करते हुए तनिक भी संतप्त

न हो ।। ११ ।।

यः प्रियं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः ।

तस्य कर्माणि सिद्ध्यन्ति न च संत्यज्यते श्रिया ॥ १२ ॥

जो भूपाल अपने गुणोंसे सदा सबका प्रिय करता है, उसके सभी कर्म सफल होते हैं

और सम्पत्ति कभी उसका साथ नहीं छोड़ती ।। १२ ।।

निवृत्तं प्रतिकूलेषु वर्तमानमनुप्रिये ।

भक्तं भजेत नृपतिः सदैव सुसमाहितः ॥ १३ ॥ राजा सदा सावधान रहकर अपने उस सेवकको हर तहरसे अपनावे, जो प्रतिकूल कार्योंसे अलग रहता हो और राजाका निरन्तर प्रिय करनेमें ही संलग्न हो ॥ १३ ॥ अप्रकीर्णेन्द्रियग्राममत्यन्तानुगतं शुचिम् । शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ॥ १४ ॥ जो बड़े-बड़े काम हों, उनपर जितेन्द्रिय, अत्यन्त अनुगत, पवित्र आचार-विचारवाले, शक्तिशाली और अनुरक्त पुरुषको नियुक्त करे ॥ १४ ॥ एवमेतैर्गुणैर्युक्तो योऽनुरञ्जयति भूमिपम् । भर्तुरर्थेष्वप्रमत्तं नियुज्यादर्थकर्मणि ॥ १५ ॥ इसी प्रकार जिसमें वे सब गुण मौजूद हों, जो राजाको प्रसन्न भी रख सकता हो तथा स्वामीका कार्य सिद्ध करनेके लिये सतत सावधान रहता हो, उसको धनकी व्यवस्थाके कार्यमें लगावे ॥ १५ ॥ मूढमैन्द्रियकं लुब्धमनार्यचरितं शठम् । अनतीतोपधं हिंस्रं दुर्बुद्धिमबहुश्रुतम् ॥ १६ ॥ त्यक्तोदात्तं मद्यरतं द्यूतस्त्रीमृगयापरम् । कार्ये महति युञ्जानो हीयते नृपतिः श्रिया ॥ १७ ॥ मूर्ख, इन्द्रियलोलुप, लोभी, दुराचारी, शठ, कपटी, हिंसक, दुर्बुद्धि, अनेक शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य, उच्चभावनासे रहित, शराबी, जुआरी, स्त्रीलम्पट और मृगयासक्त पुरुषको जो राजा महत्त्वपूर्ण कार्योंपर नियुक्त करता है, वह लक्ष्मीसे हीन हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ रक्षितात्मा च यो राजा रक्ष्यान् यश्चानुरक्षति । प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते ध्रुवं च महदश्नुते ॥ १८ ॥ जो नरेश अपने शरीरकी रक्षा करके रक्षणीय पुरुषोंकी भी सदा रक्षा करता है, उसकी प्रजा अभ्युदयशील होती है और वह राजा भी निश्चय ही महान् फलका भागी होता है ॥ १८ ॥ ये केचित् भूमिपतयः सर्वांस्तानन्ववेक्षयेत् । सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजातिरिच्यते ॥ १९ ॥ जो राजा अपने अप्रसिद्ध सुहृदोंके द्वारा गुप्तरूपसे समस्त भूपतियोंकी अवस्थाका निरीक्षण कराता है, वह अपने इस बर्तावके द्वारा सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥ १९ ॥ अपकृत्य बलस्थस्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । श्येनाभिपतनैरेते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥ २० ॥ किसी बलवान् शत्रु का अपकार करके हम दूर जाकर रहेंगे, ऐसा समझकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि जैसे बाज पक्षी झपट्टा मारता है, उसी प्रकार ये दूरस्थ शत्रु भी असावधानीकी अवस्थामें टूट पड़ते हैं ॥

दृढमूलस्त्वदुष्टात्मा विदित्वा बलमात्मनः । अबलानभियुञ्जीत न तु ये बलवत्तराः ॥ २१ ॥ राजा अपनेको दृढ़मूल (अपनी राजधानीको सुरक्षित) करके विरोधी लोगोंको दूर रखकर अपनी शक्तिको समझ ले; फिर अपनेसे दुर्बल शत्रुपर ही आक्रमण करे। जो अपनेसे प्रबल हों, उनपर आक्रमण न करे ॥ २१ ॥

विक्रमेण महीं लब्ध्वा प्रजा धर्मेण पालयेत् । आहवे निधनं कुर्याद् राजा धर्मपरायणः ॥ २२ ॥ पराक्रमसे इस पृथ्वीको प्राप्त करके धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करे तथा युद्धमें शत्रुओंका संहार कर डाले ॥ २२ ॥

मरणान्तमिदं सर्वं नेह किञ्चिदनामयम् । तस्माद् धर्मे स्थितो राजा प्रजा धर्मेण पालयेत् ॥ २३ ॥ राजन्! इस जगत्‌के सभी पदार्थ अन्तमें नष्ट होनेवाले हैं; यहाँ कोई भी वस्तु नीरोग या अविनाशी नहीं है। इसलिये राजाको धर्मपर स्थित रहकर प्रजाका धर्मके अनुसार ही पालन करना चाहिये ॥ २३ ॥

रक्षाधिकरणं युद्धं तथा धर्मानुशासनम् । मन्त्रचिन्ता सुखं काले पञ्चभिर्वर्धते मही ॥ २४ ॥ रक्षाके स्थान दुर्ग आदि, युद्ध, धर्मके अनुसार राज्यका शासन, मन्त्र-चिन्तन तथा यथासमय सबको सुख प्रदान करना—इन पाँचोंके द्वारा राज्यकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥

एतानि यस्य गुप्तानि स राजा राजसत्तमः । सततं वर्तमानोऽत्र राजा धत्ते महीमिमाम् ॥ २५ ॥ जिसकी ये सब बातें गुप्त या सुरक्षित रहती हैं, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ माना जाता है। इनके पालनमें सदा संलग्न रहनेवाला नरेश ही इस पृथ्वीकी रक्षा कर सकता है ॥ २५ ॥

नैतान्येकेन शक्यानि सातत्येनानुवीक्षितुम् । तेषु सर्वं प्रतिष्ठाप्य राजा भुङ्क्ते चिरं महीम् ॥ २६ ॥ एक ही पुरुष इन सभी बातोंपर सदा ध्यान नहीं रख सकता, इसलिये इन सबका भार सुयोग्य अधिकारियोंको सौंपकर राजा चिरकालतक इस भूतलका राज्य भोग सकता है ॥ २६ ॥

दातारं संविभक्तारं मार्दवोपगतं शुचिम् । असंत्यक्तमनुष्यं च तं जनाः कुर्वते नृपम् ॥ २७ ॥ जो पुरुष दानशील, सबके लिये सम्यक् विभागपूर्वक आवश्यक वस्तुओंका वितरण करनेवाला, मृदुलस्वभाव, शुद्ध आचार-विचारवाला तथा मनुष्योंका त्याग न करनेवाला होता है, उसीको लोग राजा बनाते हैं ॥ २७ ॥

यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत् प्रतिपद्यते । आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते ॥ २८ ॥ जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़ उस ज्ञानको ग्रहण कर लेता है, उसके पीछे यह सारा जगत् चलता है ॥ २८ ॥

योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते । शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव ॥ २९ ॥ अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा । जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ३० ॥ जो मनके प्रतिकूल होनेके कारण अपने ही प्रयोजनकी सिद्धि चाहनेवाले सुहृद्की बात नहीं सहन करता और अपनी अर्थसिद्धिके विरोधी वचनोंको भी सुनता है, सदा अनमना-सा रहता है, जो बुद्धिमान् शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए बर्तावका सदा सेवन नहीं करता एवं पराजित या अपराजित व्यक्तियोंको उनके परम्परागत आचारका पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय-धर्मसे गिर जाता है ॥ २९-३० ॥

निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः । पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् । एतेभ्यो नित्ययुक्तः सन् रक्षेदात्मानमेव तु ॥ ३१ ॥ जिसको कभी कैद किया गया हो ऐसे मन्त्रीसे, विशेषतः स्त्रियोंसे, विषम पर्वतसे, दुर्गम स्थानसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे सदा सावधान रहकर राजा अपनी रक्षा करे ॥ ३१ ॥

मुख्यानमात्यान् यो हित्वा निहीनान् कुरुते प्रियान् । स वै व्यसनमासाद्य गाधमार्तो न विन्दति ॥ ३२ ॥ जो प्रधान मन्त्रियोंका त्याग करके निम्नश्रेणीके मनुष्योंको अपना प्रिय बनाता है, वह संकटके घोर समुद्रमें पड़कर पीड़ित हो कहीं आश्रय नहीं पाता है ॥

यः कल्याणगुणान् ज्ञातीन् प्रद्वेषान्नो बुभूषति । अदृढात्मा दृढक्रोधः स मृत्योर्वसतेऽन्तिके ॥ ३३ ॥ जो द्वेषवश कल्याणकारी गुणोंवाले अपने सजातीय बन्धुओं एवं कुटुम्बीजनोंका सम्मान नहीं करता, जिसका चित्त चंचल है तथा जो क्रोधको दृढ़ता-पूर्वक पकड़े रहनेवाला है, वह सदा मृत्युके समीप निवास करता है ॥ ३३ ॥

अथ यो गुणसम्पन्नान् हृदयस्याप्रियानपि । प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥ ३४ ॥ जो राजा हृदयको प्रिय लगनेवाले न होनेपर भी गुणवान् पुरुषोंको प्रीतिजनक बर्तावद्वारा अपने वशमें कर लेता है, वह दीर्घकालतक यशस्वी बना रहता है ॥

नाकाले प्रणयेदर्थान्नाप्रिये जातु संज्वरेत् ।

प्रिये नातिभृशं तुष्येद् युज्येतारोग्यकर्मणि ॥ ३५ ॥
राजाको चाहिये कि वह असमयमें कर लगाकर धन-संग्रहकी चेष्टा न करे। कोई अप्रिय कार्य हो जानेपर कभी चिन्ताकी आगमें न जले और प्रिय कार्य बन जानेपर अत्यन्त हर्षसे फूल न उठे और अपने शरीरको नीरोग बनाये रखनेके कार्यमें तत्पर रहे ॥ ३५ ॥

के वानुरक्ताः राजानः के भयात् समुपाश्रिताः ।
मध्यस्थदोषाः के चैषामिति नित्यं विचिन्तयेत् ॥ ३६ ॥
इस बातका ध्यान रखे कि कौन राजा मुझसे प्रेम रखते हैं? कौन भयके कारण मेरा आश्रय लिये हुए हैं? इनमेंसे कौन मध्यस्थ हैं और कौन-कौन नरेश मेरे शत्रु बने हुए हैं? ॥ ३६ ॥

न जातु बलवान् भूत्वा दुर्बले विश्वसेत् क्वचित् ।
भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥ ३७ ॥
राजा स्वयं बलवान् होकर भी कभी अपने दुर्बल शत्रु का विश्वास न करे; क्योंकि ये असावधानीकी दशामें बाज पक्षीकी तरह झपट्टा मारते हैं ॥ ३७ ॥

अपि सर्वगुणैर्युक्तं भर्तारं प्रियवादिनम् ।
अभिद्रुह्यति पापात्मा न तस्माद् विश्वसेज्‍जनात् ॥ ३८ ॥
जो पापात्मा मनुष्य अपने सर्वगुणसम्पन्न और सर्वदा प्रिय वचन बोलनेवाले स्वामीसे भी अकारण द्रोह करता है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥

एवं राजोपनिषदं ययातिः स्माह नाहुषः ।
मनुष्यविषये युक्तो हन्ति शत्रूननुत्तमान् ॥ ३९ ॥
नहुषपुत्र राजा ययातिने मानवमात्रके हितमें तत्पर हो इस राजोपनिषद्का वर्णन किया है। जो इसमें निष्ठा रखकर इसके अनुसार चलता है, वह बड़े-बड़े शत्रुओंका विनाश कर डालता है ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु
त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवगीताविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 633)

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः

वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव

वामदेव उवाच

अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद् वसुधाधिपः ।

जघन्यमाहुर्विजयं युद्धेन च नराधिप ॥ १ ॥

वामदेवजी कहते हैं—नरेश्वर! राजा युद्धके सिवा किसी और ही उपायसे पहले

अपनी विजय-वृद्धिकी चेष्टा करे; युद्धसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे निम्न श्रेणीकी

बताया गया है ॥ १ ॥

न चाप्यलब्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति ।

न हि दुर्बलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीयते ॥ २ ॥

यदि राज्यकी जड़ मजबूत न हो तो राजाको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति—अनधिकृत

देशोंपर अधिकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिसके मूलमें ही दुर्बलता है, उस

राजाको वैसा लाभ होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥

यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रियराजकः ।

संतुष्टपुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ३ ॥

जिस राजाका देश समृद्धिशाली, धनधान्यसे सम्पन्न, राजाको प्रिय माननेवाले

मनुष्योंसे परिपूर्ण और हृष्ट-पुष्ट मन्त्रियोंसे सुशोभित है, उसीकी जड़ मजबूत समझनी

चाहिये ॥ ३ ॥

यस्य योधाः सुसंतुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताः ।

अल्पेनापि स दण्डेन महीं जयति पार्थिवः ॥ ४ ॥

जिसके सैनिक संतुष्ट, राजाके द्वारा सान्त्वना-प्राप्त और शत्रुओंको धोखा देनेमें चतुर

हों, वह भूपाल थोड़ी-सी सेनाके द्वारा भी पृथ्वीपर विजय पा लेता है ॥

(दण्डो हि बलवान् यत्र तत्र साम प्रयुज्यते ।

प्रदानं सामपूर्वं च भेदमूलं प्रशस्यते ॥

जिस स्थानपर शत्रुपक्षकी सेना अधिक प्रबल हो, वहाँ पहले सामनीतिका ही प्रयोग

करना उचित है। यदि उससे काम न चले तो धन या उपहार देनेकी नीतिको अपनाना

चाहिये। इस दाननीतिके मूलमें भी यदि भेदनीतिका समावेश हो अर्थात् शत्रुओंमें फूट

डालनेकी चेष्टा की जा रही हो तो उसे उत्तम माना गया है ।।

त्रयाणां विफलं कर्म यदा पश्येत भूमिपः ।

रन्ध्रं ज्ञात्वा ततो दण्डं प्रयुञ्जीताविचारयन् ॥)

जब राजा साम, दान और भेद—तीनोंका प्रयोग निष्फल देखे, तब शत्रु की दुर्बलताका पता लगाकर दूसरा कोई विचार मनमें न लाते हुए दण्डनीतिका ही प्रयोग करे—शत्रुके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ पौरजानपदा यस्य भूतेषु च दयालवः । सधना धान्यवन्तश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ५ ॥ जिसके नगर और जनपदमें रहनेवाले लोग समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले और धन-धान्यसे सम्पन्न होते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥ (राष्ट्रकर्मकरा ह्येते राष्ट्रस्य च विरोधिनः । दुर्विनीता विनीताश्च सर्वे साध्याः प्रयत्नतः ॥ ये नगर और जनपदके लोग राष्ट्रके कार्यकी सिद्धि करनेवाले और उसके विरोधी भी होते हैं। उद्दण्ड और विनयशील भी होते हैं। उन सबको प्रयत्नपूर्वक अपने वशमें करना चाहिये ॥ चाण्डालम्लेच्छजात्याश्च पाषण्डाश्च विकर्मिणः । बलिनश्चाश्रमाश्चैव तथा गायकनर्तकाः ॥ यस्य राष्ट्रे वसन्त्येते धान्योपचयकारिणः । आयवृद्धौ सहायाश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥) चाण्डाल, म्लेच्छ, पाखण्डी, शास्त्र-विरुद्ध कर्म करनेवाले, बलवान्, सभी आश्रमोंके निवासी तथा गायक और नर्तक—इन सबको प्रयत्नपूर्वक वशमें करना चाहिये। जिसके राज्यमें ये सब लोग धन-धान्यकी वृद्धि करनेवाले और आय बढ़ानेमें सहायक होकर रहते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥ प्रतापकालमधिकं यदा मन्येत चात्मनः । तदा लिप्सेत मेधावी परभूमिधनान्युत ॥ ६ ॥ बुद्धिमान् राजा जब अपने प्रतापको प्रकाशित करनेका उपयुक्त अवसर समझे, तभी दूसरेका राज्य और धन लेनेकी चेष्टा करे ॥ ६ ॥ भोगेष्वदयमानस्य भूतेषु च दयावतः । वर्धते त्वरमाणस्य विषयो रक्षितात्मनः ॥ ७ ॥ जिसके वैभव-भोग दिनोंदिन बढ़ रहे हों, जो सब प्राणियोंपर दया रखता हो, काम करनेमें फुर्तीला हो और अपने शरीरकी रक्षाका ध्यान रखता हो, उस राजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ॥ ७ ॥ तक्षेदात्मानमेवं स वनं परशुना यथा । यः सम्यग् वर्तमानेषु स्वेषु मिथ्या प्रवर्तते ॥ ८ ॥ जो अच्छा बर्ताव करनेवाले स्वजनोंके प्रति मिथ्या व्यवहार करता है, वह इस बर्तावद्वारा कुल्हाड़ीसे जंगलकी भाँति अपने आपका ही उच्छेद कर डालता है ॥ ८ ॥

नैव द्विषन्तो हीयन्ते राज्ञो नित्यमनिघ्नतः ।
क्रोधं निहन्तुं यो वेद तस्य द्वेष्टा न विद्यते ॥ ९ ॥
यदि राजा कभी किसी द्वेष करनेवालेको दण्ड न दे तो उससे द्वेष करनेवालोंकी कमी नहीं होती है; परंतु जो क्रोधको मारनेकी कला जानता है, उसका कोई द्वेषी नहीं रहता है ॥ ९ ॥

यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद् बुधः ।
यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ॥ १० ॥
जिसे श्रेष्ठ पुरुष बुरा समझते हों, बुद्धिमान् राजा वैसा कर्म कभी न करे। जिस कार्यको सबके लिये कल्याणकारी समझे, उसीमें अपने आपको लगावे ॥

नैनमन्येऽवजानन्ति नात्मना परितप्यते ।
कृत्यशेषेण यो राजा सुखान्यनुबुभूषति ॥ ११ ॥
जो राजा अपना कर्तव्य पूर्ण करके ही सुखका अनुभव करना चाहता है, उसका न तो दूसरे लोग अनादर करते हैं और न वह स्वयं ही संतप्त होता है ॥ ११ ॥

इदं वृत्तं मनुष्येषु वर्तते यो महीपतिः ।
उभौ लोकौ विनिर्जित्य विजये सम्प्रतिष्ठते ॥ १२ ॥
जो राजा प्रजाके प्रति ऐसा बर्ताव करता है, वह इहलोक और परलोक दोनोंको जीतकर विजयमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो वामदेवेन सर्वं तत् कृतवान् नृपः ।
तथा कुर्वंस्त्वमप्येतौ लोकौ जेता न संशयः ॥ १३ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! वामदेवजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर राजा वसुमना सब कार्य उसी प्रकार करने लगे। यदि तुम भी ऐसा ही आचरण करोगे तो निःसंदेह लोक और परलोक दोनों सुधार लोगे ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवगीताविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं)

विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अथ यो विजिगीषेत क्षत्रियः क्षत्रियं युधि ।
कस्तस्य विजये धर्मो ह्येतं पृष्टो वदस्व मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि कोई क्षत्रिय राजा दूसरे क्षत्रिय नरेशपर युद्धमें विजय पाना चाहे तो उसे अपनी जीतके लिये किस धर्मका पालन करना चाहिये? इस समय यही मेरा आपसे प्रश्न है, आप मुझे इसका उत्तर दीजिये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ससहायोऽसहायो वा राष्ट्रमागम्य भूमिपः ।
ब्रूयादहं वो राजेति रक्षिष्यामि च वः सदा ॥ २ ॥
मम धर्मबलिं दत्त किं वा मां प्रतिपत्स्यथ ।
ते चेत् तमागतं तत्र वृणुयुः कुशलं भवेत् ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! पहले राजा सहायकोंके साथ अथवा बिना सहायकोंके ही जिसपर विजय पाना चाहता हो, उस राज्यमें जाकर वहाँके लोगोंसे कहे कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और सदा तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा, मुझे धर्मके अनुसार कर दो अथवा मेरे साथ युद्ध करो। उसके ऐसा कहनेपर यदि वे उस समागत नरेशका अपने राजाके रूपमें वरण कर लें तो सबकी कुशल हो ॥ २-३ ॥

ते चेदक्षत्रियाः सन्तो विरुध्येरन् कथंचन ।
सर्वोपायैर्नियन्तव्या विकर्मस्था नराधिप ॥ ४ ॥
नरेश्वर! यदि वे क्षत्रिय न होकर भी किसी प्रकार विरोध करें तो वर्ण-विपरीत कर्ममें लगे हुए उन सब मनुष्योंका सभी उपायोंसे दमन करना चाहिये ॥ ४ ॥

अशस्त्रं क्षत्रियं मत्वा शस्त्रं गृह्णाद् यथापरः ।
त्राणायाप्यसमर्थं तं मन्यमानमतीव च ॥ ५ ॥
यदि उस देशका क्षत्रिय शस्त्रहीन हो और अपनी रक्षा करनेमें भी अपनेको अत्यन्त असमर्थ मानता हो तो वहाँका क्षत्रियेतर मनुष्य भी देशकी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण कर सकता है ॥ ५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अथः यः क्षत्रियो राजा क्षत्रियं प्रत्युपाव्रजेत् ।

कथं सम्प्रति योद्धव्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥ युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि कोई क्षत्रिय राजा दूसरे क्षत्रिय राजापर चढ़ाई कर दे तो उस समय उसे उसके साथ किस प्रकार युद्ध करना चाहिये यह मुझे बताइये ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

नैवासन्नद्धकवचो योद्धव्यः क्षत्रियो रणे ।
एक एकेन वाच्यश्च विसृजेति क्षिपामि च ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो कवच बाँधे हुए न हो, उस क्षत्रियके साथ रणभूमिमें युद्ध नहीं करना चाहिये। एक योद्धा दूसरे एकाकी योद्धासे कहे ‘तुम मुझपर शस्त्र छोड़ो। मैं भी तुमपर प्रहार करता हूँ’ ॥ ७ ॥

स चेत् सन्नद्ध आगच्छेत् सन्नद्धव्यं ततो भवेत् ।
स चेत् ससैन्य आगच्छेत् ससैन्यस्तमथाह्वयेत् ॥ ८ ॥
यदि वह कवच बाँधकर सामने आ जाय तो स्वयं भी कवच धारण कर ले। यदि विपक्षी सेनाके साथ आवे तो स्वयं भी सेनाके साथ आकर शत्रुको ललकारे ॥ ८ ॥

स चेन्निकृत्या युद्ध्येत निकृत्या प्रतियोधयेत् ।
अथ चेद् धर्मतो युद्ध्येद् धर्मेणैव निवारयेत् ॥ ९ ॥
यदि वह छलसे युद्ध करे तो स्वयं भी उसी रीतिसे उसका सामना करे और यदि वह धर्मसे युद्ध आरम्भ करे तो धर्मसे ही उसका सामना करना चाहिये ॥

नाश्वेन रथिनं यायादुदियाद् रथिनं रथी ।
व्यसने न प्रहर्तव्यं न भीताय जिताय च ॥ १० ॥
घोड़ेके द्वारा रथीपर आक्रमण न करे। रथीका सामना रथीको ही करना चाहिये। यदि शत्रु किसी संकटमें पड़ जाय तो उसपर प्रहार न करे। डरे और पराजित हुए शत्रुपर भी कभी प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥

इषुर्लिप्तो न कर्णी स्यादसतामेतदायुधम् ।
यथार्थमेव योद्धव्यं न क्रुद्ध्येत जिघांसतः ॥ ११ ॥
युद्धमें विषलिप्त और कर्णी बाणका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ये दुष्टोंके अस्त्र हैं। यथार्थ रीतिसे ही युद्ध करना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति युद्धमें किसीका वध करना चाहता हो तो उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये (किंतु यथायोग्य प्रतीकार करना चाहिये) ॥ ११ ॥

साधूनां तु मिथो भेदात् साधुश्चेद् व्यसनी भवेत् ।
निष्प्राणो नाभिहन्तव्यो नानपत्यः कथंचन ॥ १२ ॥
जब श्रेष्ठ पुरुषोंमें परस्पर भेद होनेसे कोई श्रेष्ठ पुरुष संकटमें पड़ जाय, तब उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये। जो बलहीन और संतानहीन हो, उसपर तो किसी प्रकार भी आघात न करे ॥ १२ ॥