भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628

शक्तः स्यात् सुसुखो राजा कुर्यात् करणमापदि ।

प्रियो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥

राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुखका अनुभव करे और करावे तथा आपत्तिमें पड़

जाय तो उसके निवारणका प्रयत्न करे। ऐसा करनेसे वह सब प्राणियोंका प्रिय होता है और

कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।।

अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् ।

नचिरेण प्रियः स स्याद् योऽप्रियः प्रियमाचरेत् ॥ ८ ॥

राजाको चाहिये कि यदि किसीका अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे। इस

प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समयमें वह प्रिय हो जाता

है ।। ८ ।।

मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।

न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥ ९ ॥

मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे।

किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ।। ९ ।।

(अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद् बुधः ।

दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥)

नापत्रपेत प्रश्नेषु नाविभाव्यां गिरं सृजेत् ।

न त्वरेत न चासूयेत् तथा संगृह्यते परः ॥ १० ॥

विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे। सत्यको कभी न छोड़े। इन्द्रिय-संयम,

धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजाके हितका कभी परित्याग न करे। यदि कोई

कुछ पूछे तो उसका उत्तर देनेमें संकोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँहसे न निकाले,

किसी काममें जल्दबाजी न करे और किसीकी निन्दा न करे, ऐसा बर्ताव करनेसे शत्रु भी

अपने वशमें हो जाता है ।। १० ।।

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।

न तप्येदर्धकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ॥ ११ ॥

यदि अपना प्रिय हो जाय तो बहुत प्रसन्न न हो और अप्रिय हो जाय तो अत्यन्त चिन्ता

न करे। यदि आर्थिक संकट आ पड़े तो प्रजाके हितका चिन्तन करते हुए तनिक भी संतप्त

न हो ।। ११ ।।

यः प्रियं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः ।

तस्य कर्माणि सिद्ध्यन्ति न च संत्यज्यते श्रिया ॥ १२ ॥

जो भूपाल अपने गुणोंसे सदा सबका प्रिय करता है, उसके सभी कर्म सफल होते हैं

और सम्पत्ति कभी उसका साथ नहीं छोड़ती ।। १२ ।।

निवृत्तं प्रतिकूलेषु वर्तमानमनुप्रिये ।