भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 629

भक्तं भजेत नृपतिः सदैव सुसमाहितः ॥ १३ ॥ राजा सदा सावधान रहकर अपने उस सेवकको हर तहरसे अपनावे, जो प्रतिकूल कार्योंसे अलग रहता हो और राजाका निरन्तर प्रिय करनेमें ही संलग्न हो ॥ १३ ॥ अप्रकीर्णेन्द्रियग्राममत्यन्तानुगतं शुचिम् । शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ॥ १४ ॥ जो बड़े-बड़े काम हों, उनपर जितेन्द्रिय, अत्यन्त अनुगत, पवित्र आचार-विचारवाले, शक्तिशाली और अनुरक्त पुरुषको नियुक्त करे ॥ १४ ॥ एवमेतैर्गुणैर्युक्तो योऽनुरञ्जयति भूमिपम् । भर्तुरर्थेष्वप्रमत्तं नियुज्यादर्थकर्मणि ॥ १५ ॥ इसी प्रकार जिसमें वे सब गुण मौजूद हों, जो राजाको प्रसन्न भी रख सकता हो तथा स्वामीका कार्य सिद्ध करनेके लिये सतत सावधान रहता हो, उसको धनकी व्यवस्थाके कार्यमें लगावे ॥ १५ ॥ मूढमैन्द्रियकं लुब्धमनार्यचरितं शठम् । अनतीतोपधं हिंस्रं दुर्बुद्धिमबहुश्रुतम् ॥ १६ ॥ त्यक्तोदात्तं मद्यरतं द्यूतस्त्रीमृगयापरम् । कार्ये महति युञ्जानो हीयते नृपतिः श्रिया ॥ १७ ॥ मूर्ख, इन्द्रियलोलुप, लोभी, दुराचारी, शठ, कपटी, हिंसक, दुर्बुद्धि, अनेक शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य, उच्चभावनासे रहित, शराबी, जुआरी, स्त्रीलम्पट और मृगयासक्त पुरुषको जो राजा महत्त्वपूर्ण कार्योंपर नियुक्त करता है, वह लक्ष्मीसे हीन हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ रक्षितात्मा च यो राजा रक्ष्यान् यश्चानुरक्षति । प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते ध्रुवं च महदश्नुते ॥ १८ ॥ जो नरेश अपने शरीरकी रक्षा करके रक्षणीय पुरुषोंकी भी सदा रक्षा करता है, उसकी प्रजा अभ्युदयशील होती है और वह राजा भी निश्चय ही महान् फलका भागी होता है ॥ १८ ॥ ये केचित् भूमिपतयः सर्वांस्तानन्ववेक्षयेत् । सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजातिरिच्यते ॥ १९ ॥ जो राजा अपने अप्रसिद्ध सुहृदोंके द्वारा गुप्तरूपसे समस्त भूपतियोंकी अवस्थाका निरीक्षण कराता है, वह अपने इस बर्तावके द्वारा सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥ १९ ॥ अपकृत्य बलस्थस्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । श्येनाभिपतनैरेते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥ २० ॥ किसी बलवान् शत्रु का अपकार करके हम दूर जाकर रहेंगे, ऐसा समझकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि जैसे बाज पक्षी झपट्टा मारता है, उसी प्रकार ये दूरस्थ शत्रु भी असावधानीकी अवस्थामें टूट पड़ते हैं ॥