महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 630, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृढमूलस्त्वदुष्टात्मा विदित्वा बलमात्मनः । अबलानभियुञ्जीत न तु ये बलवत्तराः ॥ २१ ॥ राजा अपनेको दृढ़मूल (अपनी राजधानीको सुरक्षित) करके विरोधी लोगोंको दूर रखकर अपनी शक्तिको समझ ले; फिर अपनेसे दुर्बल शत्रुपर ही आक्रमण करे। जो अपनेसे प्रबल हों, उनपर आक्रमण न करे ॥ २१ ॥
विक्रमेण महीं लब्ध्वा प्रजा धर्मेण पालयेत् । आहवे निधनं कुर्याद् राजा धर्मपरायणः ॥ २२ ॥ पराक्रमसे इस पृथ्वीको प्राप्त करके धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करे तथा युद्धमें शत्रुओंका संहार कर डाले ॥ २२ ॥
मरणान्तमिदं सर्वं नेह किञ्चिदनामयम् । तस्माद् धर्मे स्थितो राजा प्रजा धर्मेण पालयेत् ॥ २३ ॥ राजन्! इस जगत्के सभी पदार्थ अन्तमें नष्ट होनेवाले हैं; यहाँ कोई भी वस्तु नीरोग या अविनाशी नहीं है। इसलिये राजाको धर्मपर स्थित रहकर प्रजाका धर्मके अनुसार ही पालन करना चाहिये ॥ २३ ॥
रक्षाधिकरणं युद्धं तथा धर्मानुशासनम् । मन्त्रचिन्ता सुखं काले पञ्चभिर्वर्धते मही ॥ २४ ॥ रक्षाके स्थान दुर्ग आदि, युद्ध, धर्मके अनुसार राज्यका शासन, मन्त्र-चिन्तन तथा यथासमय सबको सुख प्रदान करना—इन पाँचोंके द्वारा राज्यकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥
एतानि यस्य गुप्तानि स राजा राजसत्तमः । सततं वर्तमानोऽत्र राजा धत्ते महीमिमाम् ॥ २५ ॥ जिसकी ये सब बातें गुप्त या सुरक्षित रहती हैं, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ माना जाता है। इनके पालनमें सदा संलग्न रहनेवाला नरेश ही इस पृथ्वीकी रक्षा कर सकता है ॥ २५ ॥
नैतान्येकेन शक्यानि सातत्येनानुवीक्षितुम् । तेषु सर्वं प्रतिष्ठाप्य राजा भुङ्क्ते चिरं महीम् ॥ २६ ॥ एक ही पुरुष इन सभी बातोंपर सदा ध्यान नहीं रख सकता, इसलिये इन सबका भार सुयोग्य अधिकारियोंको सौंपकर राजा चिरकालतक इस भूतलका राज्य भोग सकता है ॥ २६ ॥
दातारं संविभक्तारं मार्दवोपगतं शुचिम् । असंत्यक्तमनुष्यं च तं जनाः कुर्वते नृपम् ॥ २७ ॥ जो पुरुष दानशील, सबके लिये सम्यक् विभागपूर्वक आवश्यक वस्तुओंका वितरण करनेवाला, मृदुलस्वभाव, शुद्ध आचार-विचारवाला तथा मनुष्योंका त्याग न करनेवाला होता है, उसीको लोग राजा बनाते हैं ॥ २७ ॥