भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 667

जो वास्तवमें मित्र नहीं हैं, वे ही भीतरसे राजाके अन्तरंग व्यक्तियोंमें फूट डालनेका प्रयत्न करते हुए ऊपरसे उसकी सेवामें लगे रहते हैं। राजा उनकी इस शठताको समझे और शत्रुओंकी भाँति उनको भी मिटानेका प्रयत्न करे ॥ ६ ॥ गजानां पार्थ वर्माणि गोवृषाजगरानी च । शल्यकण्टकलोहानि तनुत्रचमराणि च ॥ ७ ॥ सितपीतानि शस्त्राणि संनाहाः पीतलोहिताः । नानारञ्जनरक्ताः स्युः पताकाः केतवश्च ह ॥ ८ ॥ ऋष्टयस्तोमराः खङ्गा निशिताश्च परश्वधाः । फलकान्यथ चर्माणि प्रतिकल्प्यान्यनेकशः ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! राजाको चाहिये कि वह गाय, बैल तथा अजगरके चमड़ोंसे हाथियोंकी रक्षाके लिये कवच बनवावे। इसके सिवा लोहेकी कीलें, लोहे, कवच, चँवर, चमकीले और पानीदार शस्त्र, पीले और लाल रंगके कवच, बहुरंगी ध्वजा-पताकाएँ, ऋष्टि, तोमर, खड्ग, तीखे फरसे, फलक और ढाल—इन्हें भारी संख्यामें तैयार कराकर सदा अपने पास रखे ॥ ७—९ ॥ अभिनीतानि शस्त्राणि योधाश्च कृतनिश्चयाः । चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्यां वा सेनायोगः प्रशस्यते ॥ १० ॥ यदि शस्त्र तैयार हों और योद्धा भी शत्रुओंसे भिड़नेका दृढ़ निश्चय कर चुके हों, तो चैत्र या मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाको सेनाका युद्धके लिये उद्यत होकर प्रस्थान करना उत्तम माना गया है ॥ १० ॥ पक्वसस्या हि पृथिवी भवत्यम्बुमती तदा । नैवातिशीतो नात्युष्णः कालो भवति भारत ॥ ११ ॥ क्योंकि उस समय खेती पक जाती है और भूतलपर जलकी प्रचुरता रहती है। भरतनन्दन! उस समय मौसम भी न तो अधिक ठंडा रहता है और न अधिक गरम ॥ ११ ॥ तस्मात् तदा योजयेत परेषां व्यसनेऽथवा । एते हि योगाः सेनायाः प्रशस्ताः परबाधने ॥ १२ ॥ इसलिये उसी समय चढ़ाई करे अथवा जिस समय शत्रु संकटमें हो, उसी अवसरपर उसपर आक्रमण कर दे। शत्रुओंको सेनाद्वारा बाधा पहुँचानेके लिये ये ही अवसर अच्छे माने गये हैं ॥ १२ ॥ जलवांस्तृणवान् मार्गः समो गम्यः प्रशस्यते । चारैः सुविदिताभ्यासः कुशलैर्वनगोचरैः ॥ १३ ॥ युद्धके लिये यात्रा करते समय मार्ग समतल और सुगम हो तथा वहाँ जल और घास आदि सुलभ हों तो अच्छा समझा जाता है। वनमें विचरनेवाले कुशल गुप्तचरोंको मार्गके