महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 668, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविषयमें विशेष जानकारी रहा करती है ॥ १३ ॥ न ह्यारण्येन शक्येत गन्तुं मृगगणैरिव । तस्मात् सेनासु तानेव योजयन्ति जयार्थिनः ॥ १४ ॥ वन्य पशुओंकी भाँति मनुष्य जंगलमें आसानीसे नहीं चल सकते; इसलिये विजयाभिलाषी राजा सेनाओंमें मार्गदर्शन करानेके लिये उन्हीं गुप्तचरोंको नियुक्त करते हैं ॥ १४ ॥ अग्रतः पुरुषानीकं शक्तं चापि कुलोद्भवम् । आवासस्तोयवान् दुर्गः पर्याकाशः प्रशस्यते ॥ १५ ॥ सेनामें सबसे आगे कुलीन एवं शक्तिशाली पैदल सिपाहियोंको रखना चाहिये। शत्रुसे बचावके लिये सैनिकोंके रहनेका स्थान या किला ऐसा होना चाहिये, जहाँ पहुँचना कठिन हो, जिसके चारों ओर जलसे भरी हुई खाई और ऊँचा परकोटा हो। साथ ही उसके चारों ओर खुला आकाश होना चाहिये ॥ १५ ॥ परेषामुपसर्पणं प्रतिषेधस्तथा भवेत् । आकाशात् तु वनाभ्याशं मन्यन्ते गुणवत्तरम् ॥ १६ ॥ बहुभिर्गुणजातैश्च ये युद्धकुशला जनाः । उपन्यासो भवेत् तत्र बलानां नातिदूरतः ॥ १७ ॥ उस स्थानपर शत्रुओंके आक्रमणको रोकनेके लिये सुविधा होनी चाहिये। युद्धकुशल पुरुष सेनाकी छावनी डालनेके लिये खुले मैदानकी अपेक्षा अनेक गुणोंके कारण जंगलके निकटवर्ती स्थानको अधिक लाभदायक मानते हैं। उस वनके समीप ही सेनाका पड़ाव डालना चाहिये ॥ १६-१७ ॥ उपन्यासावतरणं पदातीनां च गूहनम् । अथ शत्रुप्रतीघातमापदर्थं परायणम् ॥ १८ ॥ वहाँ व्यूह निर्माण करनेके लिये रथ और वाहनोंसे उतरना तथा पैदल सैनिकोंको छिपाकर रखना सम्भव है। वहाँ रहकर शत्रुओंके प्रहारका जवाब दिया जा सकता है और आपत्तिके समय छिप जानेका भी सुभीता रहता है ॥ सप्तर्षीन् पृष्ठतः कृत्वा युध्येयुरचला इव । अनेन विधिना शत्रून् जिगीषेतापि दुर्जयान् ॥ १९ ॥ योद्धाओंको चाहिये कि वे सप्तर्षियोंको पीछे रखकर पर्वतकी तरह अविचलभावसे युद्ध करें। इस विधिसे आक्रमण करनेवाला राजा दुर्जय शत्रुओंको भी जीतनेकी आशा कर सकता है ॥ १९ ॥ यतो वायुर्यतः सूर्यो यतः शुक्रस्ततो जयः । पूर्वं पूर्वं ज्याय एषां संनिपाते युधिष्ठिर ॥ २० ॥