महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 669, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस ओर वायु, जिस ओर सूर्य और जिस ओर शुक्र हों, उसी ओर पृष्ठभाग रखकर युद्ध करनेसे विजय प्राप्त होती है। युधिष्ठिर! यदि ये तीनों भिन्न-भिन्न दिशाओंमें हों तो इनमें पहला-पहला श्रेष्ठ है अर्थात् वायुको पीछे रखकर शेष दोको सामने रखते हुए भी युद्ध किया जा सकता है ॥ २० ॥
अकर्दमामनुदकाममर्यादामलोष्टकाम् ।
अश्वभूमिं प्रशंसन्ति ये युद्धकुशला जनाः ॥ २१ ॥
घुड़सवार सेनाके लिये युद्धकुशल पुरुष उसी भूमिकी प्रशंसा करते हैं, जिसमें कीचड़, पानी, बाँध और ढेले न हों ॥ २१ ॥
अपङ्का गर्तरहिता रथभूमिः प्रशस्यते ।
नीचद्रुमा महाकक्षा सोदका हस्तियोधिनाम् ॥ २२ ॥
रथसेनाके लिये वह भूमि अच्छी मानी गयी है, जहाँ कीचड़ और गड्ढे न हों। जिस भूमिमें नाटे वृक्ष, बहुत-से घास-फूस और जलाशय हों, वह गजारोही योद्धाओंके लिये अच्छी मानी गयी है ॥ २२ ॥
बहुदुर्गा महाकक्षा वेणुवेत्रसमाकुला ।
पदातीनां क्षमा भूमिः पर्वतोपवनानि च ॥ २३ ॥
जो भूमि अत्यन्त दुर्गम, अधिक घास-फूसवाली, बाँस और बेंतोंसे भरी हुई तथा पर्वत एवं उपवनोंसे युक्त हो, वह पैदल सेनाओंके योग्य होती है ॥ २३ ॥
पदातिबहुला सेना दृढा भवति भारत ।
रथाश्वबहुला सेना सुदिनेषु प्रशस्यते ॥ २४ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनामें पैदलोंकी संख्या बहुत अधिक हो, वह मजबूत होती है। जिसमें रथों और घोड़ोंकी संख्या बढ़ी हुई हो, वह सेना अच्छे दिनोंमें (जबकि वर्षा न होती हो) अच्छी मानी जाती है ॥ २४ ॥
पदातिनागबहुला प्रावृट्काले प्रशस्यते ।
गुणानेतान् प्रसंख्याय देशकालौ प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
बरसातमें वही सेना श्रेष्ठ समझी जाती है, जिसमें पैदलों और हाथीसवारोंकी संख्या अधिक हो। इन गुणोंका विचार करके देश और कालको दृष्टिमें रखते हुए सेनाका संचालन करना चाहिये ॥ २५ ॥
एवं संचिन्त्य यो याति तिथिनक्षत्रपूजितः ।
विजयं लभते नित्यं सेनां सम्यक् प्रयोजयन् ।
प्रसुप्तांस्तृषितान् श्रान्तान् प्रकीर्णान् नाभिघातयेत् ॥ २६ ॥
जो इन सब बातोंपर विचार करके शुभ तिथि और श्रेष्ठ नक्षत्रसे युक्त होकर शत्रुपर चढ़ाई करता है, वह सेनाका ठीक ढंगसे संचालन करके सदा ही विजयलाभ करता है। जो