महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो लोग डरपोक हों, वे यहींसे लौट जायँ और जो लोग भयानक संग्राम करते हुए शत्रुपक्षके प्रधान वीरका वध कर सकें, वे ही यहाँ ठहरें ।। ३३ ।। न संनिपाते प्रदरं वधं वा कुर्युरीदृशाः । आत्मानं च स्वपक्षं च पालयन् हन्ति संयुगे ।। ३४ ।। क्योंकि ऐसे डरपोक मनुष्य घमासान युद्धमें शत्रुओंको न तो तितर-बितर करके भगा सकते हैं और न उनका वध ही कर सकते हैं। शूरवीर पुरुष ही युद्धमें अपनी और अपने पक्षके सैनिकोंकी रक्षा करता हुआ शत्रुओंका संहार कर सकता है ।। ३४ ।। अर्थनाशो वधोऽकीर्तिरयशश्च पलायने । अमनोज्ञासुखा वाचः पुरुषस्य पलायने ।। ३५ ।। सैनिकोंको यह भी समझा देना चाहिये कि युद्धके मैदानसे भागनेमें कई प्रकारके दोष हैं, एक तो अपने प्रयोजन और धनका नाश होता है। दूसरे भागते समय शत्रुके हाथसे मारे जानेका भय रहता है, तीसरे भागनेवालेकी निन्दा होती है और सब ओर उसका अपयश फैल जाता है। इसके सिवा युद्धसे भागनेपर लोगोंके मुखसे मनुष्यको तरह-तरहकी अप्रिय और दुःखदायिनी बातें भी सुननी पड़ती हैं ।। ३५ ।। प्रतिध्वस्तोष्ठदन्तस्य न्यस्तसर्वायुधस्य च । अमित्रैरवरुद्धस्य द्विषतामस्तु नः सदा ।। ३६ ।। जिसके ओठ और दाँत टूट गये हों, जिसने सारे अस्त्र-शस्त्रोंको नीचे डाल दिया हो तथा जिसे शत्रुगण सब ओरसे घेरकर खड़े हों, ऐसा योद्धा सदा हमारे शत्रुओंकी सेनामें ही रहे ।। ३६ ।। मनुष्यापसदा ह्येते ये भवन्ति पराङ्मुखाः । राशिवर्धनमात्रास्ते नैव ते प्रेत्य नो इह ।। ३७ ।। जो लोग युद्धमें पीठ दिखाते हैं, वे मनुष्योंमें अधम हैं; केवल योद्धाओंकी संख्या बढ़ानेवाले हैं। उन्हें इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुख नहीं मिलता ।। ३७ ।। अमित्रा हृष्टमनसः प्रत्युद्यान्ति पलायिनम् । जयिनस्तु नरास्तात चन्दनैर्मण्डनेन च ।। ३८ ।। शत्रु प्रसन्नचित्त होकर भागनेवाले योद्धाका पीछा करते हैं तथा तात! विजयी मनुष्य चन्दन और आभूषणोंद्वारा पूजित होते हैं ।। ३८ ।। यस्य स्म संग्रामगता यशो वै घ्नन्ति शत्रवः । तदसह्यतरं दुःखमहं मन्ये वधादपि ।। ३९ ।। संग्रामभूमिमें आये हुए शत्रु जिसके यशका नाश कर देते हैं। उसके लिये उस दुःखको मैं मरणसे भी बढ़कर असह्य मानता हूँ ।। ३९ ।। जयं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च । या भीरूणां परा ग्लानिः शूरस्तामधिगच्छति ।। ४० ।।