महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवीरो! तुम लोग युद्धमें विजयको ही धर्म एवं सम्पूर्ण सुखोंका मूल समझो। कायरों या डरपोक मनुष्योंको जिससे भारी ग्लानि होती है, वीर पुरुष उसी प्रहार और मृत्युको सहर्ष स्वीकार करता है ॥ ४० ॥ ते वयं स्वर्गमिच्छन्तः संग्रामे त्यक्तजीविताः । जयन्तो वध्यमाना वा प्राप्नुयाम च सद्गतिम् ॥ ४१ ॥ अतः तुम लोग यह निश्चय कर लो कि हम स्वर्गकी इच्छा रखकर संग्राममें अपने प्राणोंका मोह छोड़कर लड़ेंगे। या तो विजय प्राप्त करेंगे या युद्धमें मारे जाकर सद्गति पायेंगे ॥ ४१ ॥ एवं संशप्तशपथाः समभित्यक्तजीविताः । अमित्रवाहिनीं वीराः प्रतिगाहन्त्यभीरवः ॥ ४२ ॥ जो इस प्रकार शपथ लेकर जीवनका मोह छोड़ देते हैं, वे वीर पुरुष निर्भय होकर शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं ॥ ४२ ॥ अग्रतः पुरुषानीकमसिचर्मवतां भवेत् । पृष्ठतः शकटानीकं कलत्रं मध्यतस्तथा ॥ ४३ ॥ सेनाके कूच करते समय सबसे आगे ढाल-तलवार धारण करनेवाले पुरुषोंकी टुकड़ी रखे। पीछेकी ओर रथियोंकी सेना खड़ी करे और बीचमें राज-स्त्रियोंको रखे ॥ ४३ ॥ परेषां प्रतिघातार्थं पदातीनां च बृंहणम् । अपि तस्मिन् पुरे वृद्धा भवेयुर्ये पुरोगमाः ॥ ४४ ॥ उस नगरमें जो वृद्ध पुरुष अगुआ हों, वे शत्रुओंका सामना और विनाश करनेके लिये पैदल सैनिकोंको प्रोत्साहन एवं बढ़ावा दें ॥ ४४ ॥ ये पुरस्तादभिमताः सत्त्ववन्तो मनस्विनः । ते पूर्वमभिवर्तेरंश्चैतानेवेतरे जनाः ॥ ४५ ॥ जो पहलेसे ही अपने शौर्यके लिये सम्मानित, धैर्यवान् और मनस्वी हैं, वे आगे रहें और दूसरे लोग उन्हींके पीछे-पीछे चलें ॥ ४५ ॥ अपि चोद्धर्षणं कार्यं भीरूणामपि यत्नतः । स्कन्धदर्शनमात्रात्तु तिष्ठेयुर्वा समीपतः ॥ ४६ ॥ जो डरनेवाले सैनिक हों, उनका भी प्रयत्नपूर्वक उत्साह बढ़ाना चाहिये अथवा वे सेनाका विशेष समुदाय दिखानेके लिये ही आस-पास खड़े रहें ॥ ४६ ॥ संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद् बहून् । सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह ॥ ४७ ॥ यदि अपने पास थोड़े-से सैनिक हों तो उन्हें एक साथ संघबद्ध रखकर युद्ध करनेका आदेश देना चाहिये और यदि बहुत-से योद्धा हों तो उन्हें बहुत दूरतक इच्छानुसार फैलाकर