महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरखना चाहिये। थोड़े-से सैनिकोंको बहुतोंके साथ युद्ध करना हो तो उनके लिये सूचीमुख नामक व्यूह उपयोगी होता है ।। ४७ ।। सम्प्रयुक्ते निकृष्टे वा सत्यं वा यदि वानृतम् । प्रगृह्य बाहून् क्रोशेत भग्ना भग्नाः परे इति ॥ ४८ ॥ आगतं मे मित्रबलं प्रहरध्वमभीतवत् । अपनी सेना उत्कृष्ट अवस्थामें हो या निकृष्ट अवस्थामें, बात सच्ची हो या झूठी, हाथ ऊपर उठाकर हल्ला मचाते हुए कहे, 'वह देखो, शत्रु भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, हमारी मित्रसेना आ गयी। अब निर्भय होकर प्रहार करो' ।। ४८ १/२ ।। सत्त्ववन्तोऽभिधावेयुः कुर्वन्तो भैरवान् रवान् ॥ ४९ ॥ इतनी बात सुनते ही धैर्यवान् और शक्तिशाली वीर भयंकर सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़ें ।। ४९ ।। क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः । भेरीमृदङ्गपणवान् नादयेयुः पुराश्चरान् ॥ ५० ॥ जो लोग सेनाके आगे हों, उन्हें गर्जन-तर्जन करते और किलकारियाँ भरते हुए क्रकच, नरसिंहे, भेरी, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजाने चाहिये ।। ५० ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनानीतिकथने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनानीतिका वर्णनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।