महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 679, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि सेनाकी रणयात्राके समय सैनिकोंके पीछेसे मन्द-मन्द वायु प्रवाहित हो, सामने इन्द्रधनुषका उदय हो, बार-बार बादलोंकी छाया होती रहे और सूर्यकी किरणोंका भी प्रकाश फैलता रहे तथा गीदड़, गीध और कौए भी अनुकूल दिशामें आ जायँ तो निश्चय ही उस सेनाको परम उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६-७ ॥
प्रसन्नभाः पावकश्चोर्ध्वरश्मिः
प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः ।
पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ८ ॥
यदि बिना धुएँकी आग प्रज्वलित हो, उसकी ज्वाला निर्मल हो और लपटें ऊपरकी ओर उठ रही हों अथवा उस अग्निकी शिखाएँ दाहिनी ओर जाती दिखायी देती हों तथा आहुतियोंकी पवित्र गन्ध प्रकट हो रही हो तो इन सबको भावी विजयका शुभ चिह्न बताया गया है ॥ ८ ॥
गम्भीरशब्दाश्च महास्वनाश्च
शङ्खाश्च भेर्यश्च नदन्ति यत्र ।
युयुत्सवश्चाप्रतीपा भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ९ ॥
जहाँ शंखोंकी गम्भीर ध्वनि और रणभेरीकी ऊँची आवाज फैल रही हो, युद्धकी इच्छा रखनेवाले सैनिक सर्वथा अनुकूल हों तो वहाँके लिये इसे भी भावी विजयका सूचक शुभ लक्षण कहा गया है ॥ ९ ॥
इष्टा मृगाः पृष्ठतो वामतश्च
सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च ।
जिघांसतां दक्षिणाः सिद्धिमाहु-
र्ये त्वग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति ॥ १० ॥
सेनाके प्रस्थान करते समय अथवा जानेके लिये तैयारी करते समय यदि इष्ट मृग पीछे और बायें आ जायँ तो इच्छित फल प्रदान करते हैं। तथा युद्ध करते समय दाहिने हो जायँ तो वे सिद्धिकी सूचना देते हैं; किंतु यदि सामने आ जायँ तो उस युद्धकी यात्राका निषेध करते हैं ॥ १० ॥
माङ्गल्यशब्दान् शकुना वदन्ति
हंसाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च चाषाः ।
हृष्टा योधाः सत्त्ववन्तो भवन्ति
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ११ ॥
जब हंस, क्रौंच, शतपत्र और नीलकण्ठ आदि पक्षी मंगलसूचक शब्द करते हों और सैनिक हर्ष तथा उत्साहसे सम्पन्न दिखायी देते हों तो यह भी भावी विजयका शुभ लक्षण