महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 680, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंबताया गया है ॥ ११ ॥
शस्त्रैर्यन्त्रैः कवचैः केतुभिश्च
सुभानुभिर्मुखवर्णैश्च यूनाम् ।
भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया
येषां चमूस्तेऽभिभवन्ति शत्रून् ॥ १२ ॥
जिनकी सेना भाँति-भाँतिके शस्त्र, कवच, यन्त्र तथा ध्वजाओंसे सुशोभित हो, जिनके नौजवान सैनिकोंके मुखकी सुन्दर प्रभामयी कान्तिसे प्रकाशित होती हुई सेनाकी ओर शत्रुओंको देखनेका भी साहस न होता हो, वे निश्चय ही शत्रुदलको परास्त कर सकते हैं ॥ १२ ॥
शुश्रूषवश्चानभिमानिनश्च
परस्परं सौहृदमास्थिताश्च ।
येषां योधाः शौचमनुष्ठिताश्च
जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ १३ ॥
जिनके योद्धा स्वामीकी सेवामें उत्साह रखनेवाले, अहंकाररहित, आपसमें एक-दूसरेका हित चाहनेवाले तथा शौचाचारका पालन करनेवाले हों, उनकी होनेवाली विजयका यही शुभ लक्षण बताया गया है ॥ १३ ॥
शब्दाः स्पर्शास्तथा गन्धा विचरन्ति मनःप्रियाः ।
धैर्यं चाविशते योधान् विजयस्य मुखं च तत् ॥ १४ ॥
जब योद्धाओंके मनको प्रिय लगनेवाले शब्द, स्पर्श और गन्ध सब ओर फैल रहे हों तथा उनके भीतर धैर्यका संचार हो रहा हो तो वह विजयका द्वार माना जाता है ॥ १४ ॥
इष्टो वामः प्रविष्टस्य दक्षिणः प्रविविक्षतः ।
पश्चात्संसाधयत्यर्थं पुरस्ताच्च निषेधति ॥ १५ ॥
यदि कौआ युद्धमें प्रवेश करते समय दाहिने भागमें और प्रविष्ट हो जानेके बाद बायें भागमें आ जाय तो शुभ है। पीछेकी ओर होनेसे भी वह कार्यकी सिद्धि करता है; परंतु सामने होनेपर विजयमें बाधा डालता है ॥ १५ ॥
सम्भृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां युधिष्ठिर ।
साम्नैव वर्तयेः पूर्वं प्रयतेथास्ततो युधि ॥ १६ ॥
युधिष्ठिर! विशाल चतुरंगिणी सेना एकत्र कर लेनेके बाद भी तुम्हें पहले सामनीतिके द्वारा शत्रुसे सन्धि करनेका ही प्रयास करना चाहिये। यदि वह सफल न हो तो युद्धके लिये प्रयत्न करना उचित है ॥
जघन्य एष विजयो यद् युद्धं नाम भारत ।
यादृच्छिको युधि जयो दैवो वेति विचारणम् ॥ १७ ॥