भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 701

देखो, उनकी दीनता और देख लो उनकी मूर्खता, जो इस अनित्य जीवनके लिये मोहवश धनमें ही दृष्टि गड़ाये रहते हैं ॥ ४३ ॥ संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते । संयोगे च वियोगान्ते को नु विप्रणयेन्मनः ॥ ४४ ॥ जब संग्रहका अन्त विनाश ही है, जब जीवनका अन्त मृत्यु ही है और जब संयोगका अन्त वियोग ही है, तब इनकी ओर कौन अपना मन लगायेगा? ॥ ४४ ॥ धनं वा पुरुषो राजन् पुरुषं वा पुनर्धनम् । अवश्यं प्रजहात्येव तद् विद्वान् कोऽनुसंज्वरेत् ॥ ४५ ॥ राजन्! चाहे मनुष्य धनको छोड़ता है, चाहे धन ही मनुष्यको छोड़ देता है। एक दिन अवश्य ऐसा होता है। इस बातको जाननेवाला कौन मनुष्य धनके लिये चिन्ता करेगा? ॥ ४५ ॥ (अन्यत्रोपनता ह्यापत् पुरुषं तोषयत्युत । तेन शान्तिं न लभते नाहमेवेति कारणात् ॥) दूसरोंपर पड़ी हुई आपत्ति मूर्ख मनुष्यको संतोष प्रदान करती है। वह समझता है कि मैं उस संकटमें नहीं पड़ा हूँ। इस भेददृष्टिके कारण ही उसे कभी शान्ति नहीं मिलती ॥ अन्येषामपि नश्यन्ति सुहृदश्च धनानि च । पश्य बुद्ध्या मनुष्याणां राजन्नापद्मात्मनः ॥ ४६ ॥ राजन्! दूसरोंके भी धन और सुहृद् नष्ट होते हैं; अतः तुम बुद्धिसे विचारकर देखो कि दूसरे मनुष्योंके समान ही तुम्हारी अपनी आपत्ति भी है ॥ ४६ ॥ नियच्छ यच्छ संयच्छ इन्द्रियाणि मनो गिरम् । प्रतिषेद्धा न चाप्येषु दुर्बलेष्वहितेष्वपि ॥ ४७ ॥ इन्द्रियोंको संयममें रखो, मनको वशमें करो और वाणीका संयम करके मौन रहा करो। ये मन, वाणी और इन्द्रियाँ दुर्बल हों या अहितकारक, इन्हें विषयोंकी ओर जानेसे रोकनेवाला अपने सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ प्राप्तिस्तृष्टेषु भावेषु व्यपकृष्टेष्वसम्भवः । प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति ॥ ४८ ॥ सारे पदार्थ जब संसर्गमें आते हैं, तभी दृष्टिगोचर होते हैं। दूर हो जानेपर उनका दर्शन सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थितिमें ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त तथा पराक्रमसे सम्पन्न तुम्हारे-जैसा पुरुष शोक नहीं करता है ॥ अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुनिश्चितः । ब्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव शोचति ॥ ४९ ॥ तुम्हारी इच्छा तो बहुत थोड़ी है। तुममें चपलताका दोष भी नहीं है। तुम्हारा हृदय कोमल और बुद्धि एक निश्चयपर डटी रहनेवाली है तथा तुम जितेन्द्रिय होनेके साथ ही

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