महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 702, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्यसे सम्पन्न भी हो; अतः तुम्हारे-जैसे पुरुषको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४९ ॥ न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि । नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुष्टां कापुरुषोचिताम् ॥ ५० ॥ तुमको हाथमें कपाल लेकर भीख माँगनेवालोंकी तथा निर्दय पुरुषोंकी उस कपटभरी वृत्तिकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जो अत्यन्त पापपूर्ण, अनेक दोषोंसे दूषित तथा कायरोंके ही योग्य है ॥ ५० ॥ अपि मूलफलाजीवो रमस्वैको महावने । वाग्यतः संगृहीतात्मा सर्वभूतदयान्वितः ॥ ५१ ॥ तुम मूल-फलसे जीवन-निर्वाह करते हुए विशाल वनमें अकेले ही विचरण करो। वाणीको संयममें रखकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें करो और सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दयाभाव बनाये रखो ॥ ५१ ॥ सदृशं पण्डितस्यै तदीषादन्तेन दन्तिना । यदेको रमतेऽरण्येष्वारण्ये नैव तुष्यति ॥ ५२ ॥ तुम-जैसे विद्वान् पुरुषके योग्य कार्य तो यह है कि वनमें ईषाके समान बड़े-बड़े दाँतवाले जंगली हाथीके साथ अकेला विचरे और जंगलके ही पत्र, पुष्प तथा फल-मूल खाकर संतुष्ट रहे ॥ ५२ ॥ महाह्रदः संक्षुभित आत्मनैव प्रसीदति । (इत्थं नरोऽप्यात्मनैव कृतप्रज्ञः प्रसीदति ।) एतदेवंगतस्याहं सुखं पश्यामि जीवितुम् ॥ ५३ ॥ जैसे क्षुब्ध हुआ महान् सरोवर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार विशुद्ध बुद्धिवाला मनुष्य क्षुब्ध होनेपर भी निर्मल हो जाता है। अतः राजकुमार! इस अवस्थामें तुम्हारा इस रूपमें आ जाना; अर्थात् तुम्हारे मनमें ऐसे विशुद्ध भावका उदय होना शुभ है। इस प्रकारके जीवनको ही मैं सुखमय समझता हूँ ॥ ५३ ॥ असम्भवे श्रियो राजन् हीनस्य सचिवादिभिः । दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेयो मन्यते भवान् ॥ ५४ ॥ राजन्! तुम्हारे लिये अब धन-सम्पत्तिकी कोई सम्भावना नहीं है। तुम मन्त्री आदिसे भी रहित हो गये हो तथा दैव भी तुम्हारे प्रतिकूल ही है, ऐसी अवस्थामें तुम अपने लिये किस मार्गका अवलम्बन अच्छा समझते हो? ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥