महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 705, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदातुमर्हति ते वित्तं वैदेहः सत्यसंगरः । प्रमाणं सर्वभूतेषु प्रग्रहं च भविष्यसि ॥ ७ ॥ तुम पवित्र व्यवहार और उत्तम कर्मद्वारा अपने प्रति विदेहराजका विश्वास उत्पन्न करो। विदेहराज सत्यप्रतिज्ञ हैं; अतः वे तुम्हें अवश्य धन प्रदान करेंगे। यदि ऐसा हुआ तो तुम समस्त प्राणियोंके लिये प्रमाणभूत (विश्वासपात्र) तथा राजाकी दाहिनी बाँह हो जाओगे ॥ ६-७ ॥ ततः सहायान् सोत्साहाँल्लप्स्यसेऽव्यसनान् शुचीन् । वर्तमानः स्वशास्त्रेण संयतात्मा जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥ अभ्युद्धरति चात्मानं प्रसादयति च प्रजाः । फिर तो तुम्हें बहुत-से शुद्ध हृदयवाले, दुर्व्यसनोंसे रहित तथा उत्साही सहायक मिल जायँगे। जो मनुष्य शास्त्रके अनुकूल आचरण करता हुआ अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखता है, वह अपना तो उद्धार करता ही है, प्रजाको भी प्रसन्न कर लेता है ॥ ८१/३ ॥ तेनैव त्वं धृतिमती श्रीमता चाभिसत्कृतः ॥ ९ ॥ प्रमाणं सर्वभूतेषु गत्वा च ग्रहणं महत् । ततः सुहृद्बलं लब्ध्वा मन्त्रयित्वा सुमन्त्रिभिः ॥ १० ॥ आन्तरैर्भेदयित्वारीन् बिल्वं बिल्वेन भेदये । राजा जनक बड़े धीर और श्रीसम्पन्न हैं। जब वे तुम्हारा सत्कार करेंगे, तब सभी लोगोंके विश्वास-पात्र होकर तुम अत्यन्त गौरवान्वित हो जाओगे। उस अवस्थामें तुम मित्रोंकी सेना इकट्ठी करके अच्छे मन्त्रियोंके साथ सलाह लेकर अन्तरंग व्यक्तियों-द्वारा शत्रुदलमें फूट डलवाकर बेलको बेलसे ही फोड़ो (शत्रुके सहयोगसे ही शत्रु्का विध्वंस कर डालना) ॥ ९-१०१/३ ॥ परैर्वा संविदं कृत्वा बलमप्यस्य घातय ॥ ११ ॥ अलभ्या ये शुभा भावाः स्त्रियश्चाच्छादनानि च । शय्यासनानि यानानि महार्हाणि गृहाणि च ॥ १२ ॥ पक्षिणो मृगजातानि रसगन्धाः फलानि च । तेष्वेव सज्जयेथास्त्वं यथा नश्यत्ययं परः ॥ १३ ॥ अथवा दूसरोंसे मेल करके उन्हींके द्वारा शत्रुके बलका भी नाश कराओ। राजकुमार! जो शुभ पदार्थ अलभ्य हैं, उनमें तथा स्त्री, ओढ़ने-बिछानेके सुन्दर वस्त्र, अच्छे-अच्छे पलंग, आसन, वाहन, बहुमूल्य गृह, तरह-तरहके रस, गन्ध और फल—इन्हीं वस्तुओंमें शत्रुको आसक्त करो। भाँति-भाँतिके पक्षियों और विभिन्न जातिके पशुओंके पालनकी भी आसक्ति शत्रुके मनमें पैदा करो, जिससे यह शत्रु धीरे-धीरे धनहीन होकर स्वतः नष्ट हो जाय ॥ ११—१३ ॥ यद्येवं प्रतिषेद्धव्यो यद्युपेक्षणमर्हति ।