महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 706, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन जातु विवृतः कार्यः शत्रुः सुनयमिच्छता ॥ १४ ॥ यदि ऐसा करते समय कभी शत्रुको उस व्यसनकी ओर जानेसे रोकने या मना करनेकी आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिये, अथवा वह उपेक्षाके योग्य हो तो उपेक्षा ही कर देनी चाहिये; किंतु उत्तम नीतिका फल चाहनेवाले राजाको चाहिये कि वह किसी भी दशामें शत्रुपर अपना गुप्त मनोभाव प्रकट न होने दे ॥ १४ ॥
रमस्व परमामित्रे विषये प्राज्ञसम्मतः । भजस्व श्वेतकाकीयैर्मित्रधर्ममनर्थकैः ॥ १५ ॥ तुम बुद्धिमानोंके विश्वासभाजन बनकर अपने महाशत्रुके राज्यमें सानन्द विचरण करो और कुत्ते, हिरन, तथा कौओंकी तरह* चौकन्ने रहकर निरर्थक बर्तावोंद्वारा विदेहराजके प्रति मित्रधर्मका पालन करो ॥
आरम्भांश्चास्य महतो दुश्चरांश्च प्रयोजय । नदीवच्च विरोधांश्च बलवद्भिर्विरुध्यताम् ॥ १६ ॥ शत्रुको इतने बड़े-बड़े कार्य करनेकी प्रेरणा दो, जिनका पूरा होना अत्यन्त कठिन हो और बलवान् राजाओंके साथ शत्रु का ऐसा विरोध करा दो, जो किसी विशाल नदीके समान अत्यन्त दुस्तर हो ॥ १६ ॥
उद्यानानि महार्हाणि शयनान्यासनानि च । प्रतिभोगसुखेनैव कोशमस्य विरेचय ॥ १७ ॥ बड़े-बड़े बगीचे लगवाकर, बहुमूल्य पलंग-बिछौने तथा भोग-विलासके अन्य साधनोंमें खर्च कराकर उसका सारा खजाना खाली करा दो ॥ १७ ॥
यज्ञदाने प्रशाध्यस्मै ब्राह्मणाननुवर्ण्य तान् । ते त्वां प्रतिकरिष्यन्ति तं भोक्ष्यन्ति वृका इव ॥ १८ ॥ तुम मिथिलाके प्रसिद्ध ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करके उनके द्वारा विदेहराजको बड़े-बड़े यज्ञ और दान करनेका उपदेश दिलाओ। नित्य ही वे ब्राह्मण तुम्हारा उपकार करेंगे और विदेहराजको भेड़ियोंके समान नोच खायेंगे ॥ १८ ॥
असंशयं पुण्यशीलः प्राप्नोति परमां गतिम् । त्रिविष्टपे पुण्यतमं स्थानं प्राप्नोति मानवः ॥ १९ ॥ इसमें संदेह नहीं कि पुण्यशील मानव परम गतिको प्राप्त होता है। उसे स्वर्गलोकमें परम पवित्र स्थानकी प्राप्ति होती है ॥ १९ ॥
कोशक्षये त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति । उभयत्र प्रयुक्तस्य धर्मेणाधर्म एव च ॥ २० ॥ कोसलराज! धर्म अथवा अधर्म या उन दोनोंमें ही प्रवृत्त रहनेवाले राजाका कोष निश्चय ही खाली हो जाता है। खजाना खाली होते ही राजा अपने शत्रुओंके वशमें आ जाता है ॥ २० ॥