भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 707

फलार्थमूलं व्युच्छिद्येत् तेन नन्दन्ति शत्रवः ।
न चास्मै मानुषं कर्म दैवमस्योपवर्णय ॥ २१ ॥
शत्रुके राज्यमें जो फल-मूल और खेती आदि हो, उसे गुप्तरूपसे नष्ट करा दे। इससे उसके शत्रु प्रसन्न होते हैं। यह कार्य किसी मनुष्यका किया हुआ न बतावे। दैवी घटना कहकर इसका वर्णन करे ॥ २१ ॥

असंशयं दैवपरः क्षिप्रमेव विनश्यति ।
याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्य तम् ॥ २२ ॥
इसमें संदेह नहीं कि दैवका मारा हुआ मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। हो सके तो शत्रुको विश्वजित् नामक यज्ञमें लगा दो और उसके द्वारा दक्षिणारूपमें सर्वस्वदान कराकर उसे निर्धन बना दो ॥ २२ ॥

ततो गच्छसि सिद्धार्थःपीड्यमानं महाजनम् ।
योगधर्मविदं पुण्यं कंचिदस्योपवर्णयेत् ॥ २३ ॥
अपि त्यागं बुभूषेत कच्चिद् गच्छेदनामयम् ।
सिद्धैनौषधियोगेन सर्वशत्रुविनाशिना ।
नागानश्वांन् मनुष्यांश्च कृतकैरुपघातयेत् ॥ २४ ॥
इससे तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। तदनन्तर तुम्हें कष्ट पाते हुए किसी श्रेष्ठपुरुषकी दुरवस्थाका और किसी योगधर्मके ज्ञाता पुण्यात्मा पुरुषकी महिमाका राजाके सामने वर्णन करना चाहिये, जिससे शत्रु राजा अपने राज्यको त्याग देनेकी इच्छा करने लगे। यदि कदाचित् वह प्रकृतिस्थ ही रह जाय, उसके ऊपर वैराग्यका प्रभाव न पड़े, तब अपने नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा सर्वशत्रुविनाशक सिद्ध औषधके प्रयोगसे शत्रुके हाथी, घोड़े और मनुष्योंको मरवा डालना चाहिये ॥ २३-२४ ॥

एते चान्ये च बहवो दम्भयोगाः सुचिन्तिताः ।
शक्या विषहता कर्तुं पुरुषेण कृतात्मना ॥ २५ ॥
राजकुमार! अपने मनको वशमें रखनेवाला पुरुष यदि धर्मविरुद्ध आचरण करना सह सके तो ये तथा और भी बहुत-से भलीभाँति सोचे हुए कपटपूर्ण प्रयोग हैं, जो उसके द्वारा किये जा सकते हैं ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥

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