भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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नरेश्वर! धनसे धर्मका पालन, कामनाकी पूर्ति, स्वर्गकी प्राप्ति, हर्षकी वृद्धि, क्रोधकी सफलता, शास्त्रोंका श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओंका दमन—ये सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।। २१ ।।

धनात् कुलं प्रभवति धनाद् धर्मः प्रवर्धते । नाधनस्यास्त्ययं लोको न परः पुरुषोत्तम ।। २२ ।। धनसे कुलकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और धनसे ही धर्मकी वृद्धि होती है। पुरुषप्रवर! निर्धनके लिये तो न यह लोक सुखदायक होता है, न परलोक ।। २२ ।।

नाधनो धर्मकृत्यानि यथावदनुतिष्ठति । धनाद्धि धर्मः स्रवति शैलादभि नदी यथा ।। २३ ।। निर्धन मनुष्य धार्मिक कृत्योंका अच्छी तरह अनुष्ठान नहीं कर सकता। जैसे पर्वतसे नदी झरती रहती है, उसी प्रकार धनसे ही धर्मका स्रोत बहता रहता है ।। २३ ।।

यः कृशार्थः कृशगवः कृशभृत्यः कृशातिथिः । स वै राजन् कृशो नाम न शरीरकृशः कृशः ।। २४ ।। राजन्! जिसके पास धनकी कमी है, गौएँ और सेवक भी कम हैं तथा जिसके यहाँ अतिथियोंका आना-जाना भी बहुत कम हो गया है, वास्तवमें वही कृश (दुर्बल) कहलाने योग्य है। जो केवल शरीरसे कृश है, उसे कृश नहीं कहा जा सकता ।। २४ ।।

अवेक्षस्व यथान्यायं पश्य देवासुरं यथा । राजन् किमन्यज्जातीनां वधाद् गृद्धयन्ति देवताः ।। २५ ।। आप न्यायके अनुसार विचार कीजिये और देवताओं तथा असुरोंके बर्तावपर दृष्टि डालिये। राजन्! देवता अपने जाति-भाइयोंका वध करनेके सिवा और क्या चाहते हैं (एक पिताकी संतान होनेके कारण देवता और असुर परस्पर भाई-भाई ही तो हैं) ।। २५ ।।

न चेद्धर्तव्यमन्यस्य कथं तद्धर्ममारभेत् । एतावानेव वेदेषु निश्चयः कविभिः कृतः ।। २६ ।। अध्येतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता । सर्वथा धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि यत्नतः ।। २७ ।। यदि राजाके लिये दूसरेके धनका अपहरण करना उचित नहीं है, तो वह धर्मका अनुष्ठान कैसे कर सकता है? वेदशास्त्रोंमें भी विद्वानोंने राजाके लिये यही निर्णय दिया है कि 'राजा प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करे, विद्वान् बने, सब प्रकारसे संग्रह करके धन ले आवे और यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करे' ।।

द्रोहाद् देवैरवाप्तानि दिवि स्थानानि सर्वशः । द्रोहात् किमन्यज्ज्ञातीनां गृद्धयन्ते येन देवताः ।। २८ ।। जाति-भाइयोंसे द्रोह करके ही देवताओंने स्वर्ग-लोकके सभी स्थानोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया है। देवता जिससे धन या राज्य पाना चाहते हैं, वह जातिद्रोहके सिवा और क्या