महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै? ॥ २८ ॥
इति देवा व्यवसिता वेदवादाश्च शाश्वताः ।
अधीयतेऽध्यापयन्ते यजन्ते याजयन्ति च ॥ २९ ॥
कृत्स्नं तदेव तच्छ्रेयो यदप्याददतेऽन्यतः ।
न पश्यामोऽनपकृतं धनं किंचित् क्वचिद् वयम् ॥ ३० ॥
यही देवताओंका निश्चय है और यही वेदोंका सनातन सिद्धान्त है। धनसे ही द्विज वेद-शास्त्रोंको पढ़ते और पढ़ाते हैं, धनके द्वारा ही यज्ञ करते और कराते हैं तथा राजा-लोग दूसरोंको युद्धमें जीतकर जो उनका धन ले आते हैं, उसीसे वे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। किसी भी राजाके पास हम कोई भी ऐसा धन नहीं देखते हैं, जो दूसरोंका अपकार करके न लाया गया हो ॥ २९-३० ॥
एवमेव हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ।
जित्वा ममेयं ब्रुवते पुत्रा इव पितुर्धनम् ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार सभी राजा इस पृथिवीको जीतते हैं और जीतकर कहने लगते हैं कि 'यह मेरी है'। ठीक वैसे ही जैसे पुत्र पिताके धनको अपना बताते हैं ॥ ३१ ॥
राजर्षयोऽपि ते स्वर्ग्या धर्मो ह्येषां निरूच्यते ।
यथैव पूर्णादुदधेः स्यन्दन्त्यापो दिशो दश ॥ ३२ ॥
एवं राजकुलाद् वित्तं पृथिवीं प्रति तिष्ठति ।
प्राचीनकालमें जो राजर्षि हो गये हैं, जो कि इस समय स्वर्गमें निवास करते हैं, उनके मतमें भी राज-धर्मकी ऐसी ही व्याख्या की गयी है जैसे भरे हुए महासागरसे मेघके रूपमें उठा हुआ जल सम्पूर्ण दिशाओंमें बरस जाता है, उसी प्रकार धन राजाओंके यहाँसे निकलकर सम्पूर्ण पृथ्विीमें फैल जाता है ॥ ३२ १/२ ॥
आसीदियं दिलीपस्य नृगस्य नहुषस्य च ॥ ३३ ॥
अम्बरीषस्य मान्धातुः पृथिवी सा त्वयि स्थिता ।
स त्वां द्रव्यमयो यज्ञः सम्प्राप्तः सर्वदक्षिणः ॥ ३४ ॥
पहले यह पृथ्वी बारी-बारीसे राजा दिलीप, नृग, नहुष, अम्बरीष और मान्धाताके अधिकारमें रही है, वही इस समय आपके अधीन हो गयी है। अतः आपके समक्ष सर्वस्वकी दक्षिणा देकर द्रव्यमय यज्ञके अनुष्ठान करनेका अवसर प्राप्त हुआ है ॥ ३३-३४ ॥
तं चेन्न यजसे राजन् प्राप्तस्त्वं राज्यकिल्बिषम् ।
येषां राजाश्वमेधेन यजते दक्षिणावता ॥ ३५ ॥
उपेत्य तस्यावभृथे पूताः सर्वे भवन्ति ते ।
राजन्! यदि आप यज्ञ नहीं करेंगे तो आपको सारे राज्यका पाप लगेगा। जिन देशोंके राजा दक्षिणायुक्त अश्वमेध यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन करते हैं, उनके यज्ञकी समाप्तिपर उन देशोंके सभी लोग वहाँ आकर अवभृथस्नान करके पवित्र होते हैं ॥ ३५ १/२ ॥