महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपराधैर्न तावन्तो भृत्याः शिष्टा नराधिपैः ।
उपघातैर्यथा भृत्या दूषिता निधनं गताः ॥ ३३ ॥
राजाओंने किन्हीं वास्तविक अपराधोंके कारण उतने सेवकोंको दण्ड नहीं दिया होगा, जितने कि लोगोंके झूठे लगाये गये दोषोंसे कलंकित होकर राजाके हाथसे मारे गये हैं ॥ ३३ ॥
यदि त्वेतन्मया कार्यं मृगेन्द्र यदि मन्यसे ।
समयं कृतमिच्छामि वर्तितव्यं यथा मयि ॥ ३४ ॥
मृगराज! यदि आप मुझसे मन्त्रित्वका कार्य लेना ही ठीक समझते हैं तो मैं आपसे एक शर्त कराना चाहता हूँ, उसीके अनुसार आपको मेरे साथ बर्ताव करना उचित होगा ॥ ३४ ॥
मदीया माननीयास्ते श्रोतव्यं च हितं वचः ।
कल्पिता या च मे वृत्तिः सा भवेत् त्वयि सुस्थिरा ॥ ३५ ॥
मेरे आत्मीयजनोंका आपको सम्मान करना होगा। मेरी कही हुई हितकर बातें आपको सुननी होंगी। मेरे लिये जो जीविकाकी व्यवस्था आपने की है, वह आपहीके पास सुस्थिर एवं सुरक्षित रहे ॥ ३५ ॥
न मन्त्रयेयमन्यैस्ते सचिवैः सह कर्हिचित् ।
नीतिमन्तः परीप्सन्तो वृथा ब्रूयुः परे मयि ॥ ३६ ॥
मैं आपके दूसरे मन्त्रियोंके साथ बैठकर कभी कोई परामर्श नहीं करूँगा; क्योंकि दूसरे नीतिज्ञ मन्त्री मुझसे ईर्ष्या करते हुए मेरे प्रति व्यर्थकी बातें कहने लगेंगे ॥ ३६ ॥
एक एकेन संगम्य रहो ब्रूयां हितं वचः ।
न च ते जातिकार्येषु प्रष्टव्योऽहं हिताहिते ॥ ३७ ॥
मैं अकेला एकान्तमें अकेले आपसे मिलकर आपको हितकी बातें बताया करूँगा। आप भी अपने जाति-भाइयोंके कार्योंमें मुझसे हिताहितकी बात न पूछियेगा ॥ ३७ ॥
मया सम्मन्त्र्य पश्चाच्च न हिंस्याः सचिवास्त्वया ।
मदीयानां च कुपितो मा त्वं दण्डं निपातयेः ॥ ३८ ॥
मुझसे सलाह लेनेके बाद यदि आपके पहलेके मन्त्रियोंकी भूल प्रमाणित हो तो भी उन्हें प्राणदण्ड न दीजियेगा तथा कभी क्रोधमें आकर मेरे आत्मीयजनोंपर भी प्रहार न कीजियेगा ॥ ३८ ॥
एवमस्त्विति तेनासौ मृगेन्द्रेणाभिपूजितः ।
प्राप्तवान् मतिसाचिव्यं गोमायुर्व्याघ्रयोनितः ॥ ३९ ॥
‘अच्छा, ऐसा ही होगा’ यह कहकर शेरने उसका बड़ा सम्मान किया। सियार बाघराजाके बुद्धिदायक सचिवके पदपर प्रतिष्ठित हो गया ॥ ३९ ॥
तं तथा सुकृतं दृष्ट्वा पूज्यमानं स्वकर्मसु ।