भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 743

प्राद्विषन् कृतसंघाताः पूर्वभृत्या मुहुर्मुहुः ।। ४० ।।
सियार बहुत अच्छा कार्य करने लगा और उसको अपने सभी कार्योंमें बड़ी प्रशंसा प्राप्त होने लगी। इस प्रकार उसे सम्मानित होता देख पहलेके राजसेवक संगठित हो बारंबार उससे द्वेष करने लगे ।। ४० ।।
मित्रबुद्ध्या च गोमायुं सान्त्वयित्वा प्रसाद्य च ।
दोषैस्तु समतां नेतुमैच्छन्नशुभबुद्धयः ।। ४१ ।।
उनके मनमें दुष्टता भरी थी। वे सियारके पास मित्रभावसे आते और उसे समझा-बुझाकर प्रसन्न करके अपने ही समान दोषके पथपर चलानेकी चेष्टा करते थे ।।
अन्यथा हृषिताः पूर्वं परद्रव्याभिहारिणः ।
अशक्ताः किञ्चिदादातुं द्रव्यं गोमायुयन्त्रिताः ।। ४२ ।।
उसके आनेके पहले वे और ही प्रकारसे रहा करते थे। दूसरोंका धन हड़प लिया करते थे, परंतु अब वैसा नहीं कर सकते थे। सियारने उन सबपर ऐसी कड़ी पाबंदी लगा दी थी कि वे किसीकी कोई भी वस्तु लेनेमें असमर्थ हो गये थे ।। ४२ ।।
व्युत्थानं च विकांक्षद्भिः कथाभिः प्रतिलोभ्यते ।
धनेन महता चैव बुद्धिरस्य विलोभ्यते ।। ४३ ।।
उनकी यही इच्छा थी कि सियार भी डिग जाय; इसलिये वे तरह-तरहकी बातोंमें उसे फुसलाते और बहुत-सा धन देनेका लोभ देकर उसकी बुद्धिको प्रलोभनमें फँसाना चाहते थे ।। ४३ ।।
न चापि स महाप्राज्ञस्तस्माद् धैर्याच्चचाल ह ।
अथास्य समयं कृत्वा विनाशाय तथा परे ।। ४४ ।।
परंतु सियार बड़ा बुद्धिमान् था। अतः वह उनके प्रलोभनमें आकर धैर्यसे विचलित नहीं हुआ। तब दूसरे-दूसरे सभी सेवकोंने मिलकर उसके विनाशके लिये प्रतिज्ञा की और तदनुसार प्रयत्न आरम्भ कर दिया ।। ४४ ।।
ईप्सितं तु मृगेन्द्रस्य मांसं यत् यत्र संस्कृतम् ।
अपनीय स्वयं तद्धि तैर्न्यस्तं तस्य वेश्मनि ।। ४५ ।।
एक दिन उन सेवकोंने शेरके खानेके लिये जो मांस तैयार करके रखा गया था, उसके स्थानसे हटाकर सियारके घरमें रख दिया ।। ४५ ।।
यदर्थं चाप्यपहृतं येन तच्चैव मन्त्रितम् ।
तस्य तद् विदितं सर्वं कारणार्थं च मर्षितम् ।। ४६ ।।
जिसने जिस उद्देश्यसे उस मांसको चुराया और जिसने ऐसा करनेकी सलाह दी, वह सब कुछ सियारको मालूम हो गया तो भी किसी कारणवश उसने चुपचाप सह लिया ।। ४६ ।।
समयोऽयं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता ।