महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 745, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'वह बातोंसे ही धर्मात्मा बना हुआ है। स्वभावसे तो बड़ा क्रूर है। भीतरसे यह बड़ा पापी है; परंतु ऊपरसे धर्मात्मापनका ढोंग बनाये हुए है। उसका सारा आचार-विचार व्यर्थ दिखावेके लिये है ।। ५४ ।।
कार्यार्थं भोजनार्थेषु व्रतेषु कृतवान् श्रमम् ।
यदि विप्रत्ययो ह्येष तदिदं दर्शयाम ते ।। ५५ ।।
'उसने तो अपना काम बनाने और पेट भरनेके लिये ही व्रत करनेमें परिश्रम किया है। यदि आपको विश्वास न हो तो यह लीजिये, हम अभी उसके यहाँ से मांस ले आकर दिखाते हैं ।। ५५ ।।
तन्मांसं चैव गोमायोस्तैः क्षणादाशु ढौकितम् ।
मांसापनयनं ज्ञात्वा व्याघ्रः श्रुत्वा च तद्वचः ।। ५६ ।।
आज्ञापयामास तदा गोमायुर्वध्यतामिति ।
ऐसा कहकर वे क्षणभरमें ही सियारके घरसे उस मांसको उठा लाये। मांसके अपहरणकी बात जानकर और उन सेवकोंकी बातें सुनकर शेरने उस समय यह आज्ञा दे दी कि सियारको प्राणदण्ड दे दिया जाय ।। ५६ १/२ ।।
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः ।। ५७ ।।
मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्बोधयितुमागमत् ।
पुत्र नैतत् त्वया ग्राह्यं कपटारम्भसंयुतम् ।। ५८ ।।
शेरकी यह बात सुनकर उसकी माता हितकर वचनोंद्वारा उसे समझानेके लिये वहाँ आयी और बोली—'बेटा! इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यन्त्र हुआ मालूम पड़ता है; अतः तुम्हें इसपर विश्वास नहीं करना चाहिये ।।
कर्मसंघर्षजैर्दोषैर्दुष्येताशुचिभिः शुचिः ।
नोच्छ्रितं सहते कश्चित् प्रक्रिया वैरकारिका ।। ५९ ।।
'काममें लाग-डाँट हो जानेसे जिनके मनमें शुद्धभाव नहीं है, वे लोग निर्दोषपर ही दोषारोपण करते हैं। किसीको अपनेसे ऊँची अवस्थामें देख कर कोई-कोई ईर्ष्यावश सहन नहीं कर पाते। यही वैरभाव उत्पन्न करनेवाली प्रक्रिया है ।। ५९ ।।
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः ।। ६० ।।
उत्पाद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः ।
'कोई कितना ही शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उसपर दोषारोपण कर ही देते हैं। अपने धार्मिक कर्मोंमें लगे हुए वनवासी मुनिके भी शत्रु, मित्र और उदासीन—ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं ।। ६० १/२ ।।
लुब्धानां शुचयो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः ।। ६१ ।।
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः ।