महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 746, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपिणः ॥ ६२ ॥ 'लोभी लोग निर्लोभीसे, कायर बलवानोंसे, मूर्ख विद्वानोंसे, दरिद्र बड़े-बड़े धनियोंसे, पापाचारी धर्मात्माओंसे और कुरूप सुन्दर रूपवालोंसे द्वेष करते हैं ॥ ६१-६२ ॥
बहवः पण्डिता मूर्खा लुब्धा मायोपजीविनः । कुर्युर्दोषमदोषस्य बृहस्पतिमतेरपि ॥ ६३ ॥ 'विद्वानोंमें भी बहुत-से ऐसे अविवेकी, लोभी और कपटी होते हैं, जो बृहस्पतिके समान बुद्धि रखनेवाले निर्दोष व्यक्तिमें भी दोष ढूँढ निकालते हैं ॥ ६३ ॥
शून्यात् तच्च गृहान्मांसं यद्यप्यपहृतं तव । नेच्छते दीयमानं च साधु तावद् विमृश्यताम् ॥ ६४ ॥ 'एक ओर तो तुम्हारे सूने घरसे मांसकी चोरी हुई है और दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है, जो देनेपर भी मांस लेना नहीं चाहता—इन दोनों बातोंपर पहले अच्छी तरह विचार करो ॥ ६४ ॥
असभ्याः सभ्यसंकाशाः सभ्याश्चासभ्यदर्शनाः । दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ॥ ६५ ॥ 'संसारमें बहुतसे असभ्य प्राणी सभ्यकी तरह और सभ्यलोग असभ्यके समान देखे जाते हैं। इस तरह अनेक प्रकारके भाव दृष्टिगोचर होते हैं; अतः उनकी परीक्षा कर लेनी उचित है ॥ ६५ ॥
तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव । न चैवास्ति तलं व्योम्नि खद्योते न हुताशनः ॥ ६६ ॥ 'आकाश औंधी की हुई कड़ाहीके तले (भीतरी भागों) के समान दिखायी देता है और जुगनू अग्निके सदृश दृष्टिगोचर होता है; परंतु न तो आकाशमें तल है और न जुगनूमें अग्नि ही है ॥ ६६ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम् । परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न पश्चात् परितप्यते ॥ ६७ ॥ 'इसलिये प्रत्यक्ष दिखायी देनवाली वस्तुकी भी परीक्षा करनी उचित है। जो परीक्षा लेकर भले-बुरेकी जाँच करके किसी कार्यके लिये आज्ञा देता है, उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता ॥ ६७ ॥
न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् । श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥ ६८ ॥ 'बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ॥ ६८ ॥
स्थापितोऽयं त्वया पुत्र सामन्तेष्वपि विश्रुतः ।