भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 748

'महाराज! पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रुओंकी-सी अवस्थामें डाल दिया; अतः अब मैं आपके पास रहनेके योग्य नहीं हूँ॥ ७६ ॥ असंतोषश्च्युताः स्थानान्मानात् प्रत्यवरोपिताः । स्वयं चोपहता भृत्या ये चाप्युपहताः परैः ॥ ७७ ॥ परिक्षीणाश्च लुब्धाश्च क्रुद्धा भीताः प्रतारिताः । हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तादाना महेप्सवः ॥ ७८ ॥ संतापिताश्च ये केचिद् व्यसनौघप्रतीक्षिणः । अन्तर्हिताः सोपहितास्ते सर्वे परसाधनाः ॥ ७९ ॥ 'जो अपने पदसे गिरा दिये जानेके कारण असंतुष्ट हों, अपमानित किये गये हों, जो स्वयं राजासे पुरस्कृत होकर दूसरोंके द्वारा कलंक लगाये जानेके कारण उस आदरसे वंचित कर दिये गये हों, जो क्षीण, लोभी, क्रोधी, भयभीत और धोखेमें डाले गये हों, जिनका सर्वस्व छीन लिया गया हो, जो मानी हों, जिनकी आय छिन गयी हो, जो महत्त्वपूर्ण पद पाना चाहते हों, जिन्हें सताया गया हो, जो किसी राजापर आनेवाले संकटसमूहकी प्रतीक्षा कर रहे हों, छिपे रहते हों और मनमें कपटभाव रखते हों, वे सभी सेवक शत्रुओंका काम बनानेवाले होते हैं॥ ७७—७९ ॥ अवमानेन युक्तस्य स्थानभ्रष्टस्य वा पुनः । कथं यास्यसि विश्वासमहं तिष्ठामि वा कथम् ॥ ८० ॥ जब मैं एक बार अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित हो गया, तब पुनः आप मुझपर कैसे विश्वास कर सकेंगे? अथवा मैं ही कैसे आपके पास रह सकूँगा? ॥ समर्थ इति संगृह्य स्थापयित्वा परीक्षितः । कृतं च समयं भित्त्वा त्वयाहमवमानितः ॥ ८१ ॥ 'आपने योग्य समझकर मुझे अपनाया और मन्त्रीके पदपर बिठाकर मेरी परीक्षा ली। इसके बाद अपनी की हुई प्रतिज्ञाको तोड़कर मेरा अपमान किया॥ ८१ ॥ प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि । न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ॥ ८२ ॥ 'पहले भरी सभामें शीलवान् कहकर जिसका परिचय दिया गया हो, प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेवाले पुरुषको उसका दोष नहीं बताना चाहिये॥ ८२ ॥ एवं चावमतस्येह विश्वासं मे न यास्यसि । त्वयि चापेतविश्वास ममोद्वेगो भविष्यति ॥ ८३ ॥ 'जब मैं इस प्रकार यहाँ अपमानित हो गया तो अब आपपर मेरा विश्वास न होगा और आप भी मुझपर विश्वास नहीं कर सकेंगे। ऐसी दशामें आपसे मुझे सदा भय बना रहेगा॥ ८३ ॥