भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 749

शङ्कितस्त्वमहं भीतः परच्छिद्रानुदर्शिनः । अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद् बहुच्छलम् ॥ ८४ ॥ 'आप मुझपर संदेह करेंगे और मैं आपसे डरता रहूँगा, इधर पराये दोष ढूँढनेवाले आपके भृत्यलोग मौजूद ही हैं। इनका मुझपर तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। साथ ही यह मन्त्रीका कर्म भी अनेक प्रकारके छल-कपटसे भरा हुआ है' ।। ८४ ।।

दुःखेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते । भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥ ८५ ॥ 'प्रेमका बन्धन बड़ी कठिनाईसे टूटता है, पर जब वह एक बार टूट जाता है, तब बड़ी कठिनाईसे जुट पाता है। जो प्रेम बारंबार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमें स्नेह नहीं होता' ।। ८५ ।।

कश्चिदेव हिते भर्तुर्दृश्यते न परात्मनोः । कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावस्निग्धाः सुदुर्लभाः ॥ ८६ ॥ 'ऐसा मनुष्य कोई एक ही होता है, जो अपने या दूसरेके हितमें रत न रहकर स्वामीके ही हितमें संलग्न दिखायी देता हो; क्योंकि अपने कार्यकी अपेक्षा रखकर स्वार्थसाधनका उद्देश्य लेकर प्रेम करनेवाले तो बहुत होते हैं, परंतु शुद्धभावसे स्नेह रखनेवाले मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ हैं' ।। ८६ ।।

सुदुःखं पुरुषज्ञानं चित्तं ह्येषां चलाचलम् । समर्थो वाप्यशङ्को वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ॥ ८७ ॥ 'योग्य मनुष्यको पहचानना राजाओंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; क्योंकि उनका चित्त चंचल होता है, सैकड़ोंमेंसे कोई एक ही ऐसा मिलता है, जो सब प्रकारसे सुयोग्य होता हुआ भी संदेहसे परे हो' ।। ८७ ।।

अकस्मात् प्रक्रिया नृणामकस्माच्चापकर्षणम् । शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकार्तुं बुद्धिलाघवम् ॥ ८८ ॥ 'मनुष्यके उत्कर्ष और अपकर्ष (उन्नति और अवनति) अकस्मात् होते हैं, किसीका भला करके बुरा करना और उसे महत्त्व देकर नीचे गिराना, यह सब ओछी बुद्धिका परिणाम है' ।। ८८ ।।

एवंविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मकामार्थहेतुमत् । प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात् ॥ ८९ ॥ इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मुक्तियोंसे युक्त सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर सियारने बाघराजाको प्रसन्न कर लिया और उसकी अनुमति लेकर वह वनमें चला गया ।। ८९ ।।

अगृह्णानुनयं तस्य मृगेन्द्रस्य च बुद्धिमान् । गोमायुः प्रायमास्थाय त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ ॥ ९० ॥