भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 764

रखनेका जो फल धनकी वृद्धि आदि है, उससे वह राजा सर्वथा वंचित रह जाता है॥ ६-७॥ एतन्मे संशयस्यास्य राजधर्मान् सुदुर्विदान् । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या भवान् शंसितुमर्हति ॥ ८ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करके आप दुर्बोध राजधर्मोंका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप बुद्धिमें साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं॥ ८॥ शंसिता पुरुषव्याघ्र त्वन्नः कुलहिते रतः। क्षत्ता चैको महाप्राज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ॥ ९ ॥ पुरुषसिंह! हमारे कुलके हितमें तत्पर रहनेवाले आप ही हमें ऐसा उपदेश दे सकते हैं। दूसरे हमारे हितैषी महाज्ञानी विदुरजी हैं, जो हमें सर्वदा सदुपदेश दिया करते हैं॥ ९॥ त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदयम् । अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ॥ १० ॥ आपके मुखसे कुलके लिये हितकारी तथा राज्यके लिये कल्याणकारी उपदेश सुनकर मैं अक्षय अमृतसे तृप्त होनेके समान सुखसे सोऊँगा॥ १०॥ कीदृशाः संनिकर्षस्था भृत्याः सर्वगुणान्विताः। कीदृशैः किं कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीयते ॥ ११ ॥ कैसे सर्वगुणसम्पन्न सेवक राजाके निकट रहने चाहिये और किस कुलमें उत्पन्न हुए कैसे सैनिकोंके साथ राजाको युद्धकी यात्रा करनी चाहिये?॥ ११॥ न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता। राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनोऽभिकांक्षति ॥ १२ ॥ सेवकोंके बिना अकेला राजा राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न सभी लोग इस राज्यकी अभिलाषा करते हैं॥ १२॥

भीष्म उवाच

न च प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत। असहायवता तात नैवार्थः केचिदप्युत ॥ १३ ॥ लब्धुं लब्धा ह्यपि सदा रक्षितुं भरतर्षभ। यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः ॥ १४ ॥ हितैषी कुलजः स्निग्धः स राज्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥ भीष्मजीने कहा— तात भरतनन्दन! कोई भी सहायकोंके बिना अकेले राज्य नहीं चला सकता। राज्य ही क्या? सहायकोंके बिना किसी भी अर्थकी प्राप्ति नहीं होती। यदि प्राप्ति हो भी गयी तो सदा उसकी रक्षा असम्भव हो जाती है (अतः सेवकों या सहायकोंका

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