महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 765, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोना आवश्यक है)। जिसके सभी सेवक ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, हितैषी, कुलीन और स्नेही हों, वही राजा राज्यका फल भोग सकता है ॥ १३-१५ ॥ मन्त्रिणो यस्य कुलजा असंहार्याः सहोषिताः । नृपतेर्मतिदाः सन्तः सम्बन्धज्ञानकोविदाः ॥ १६ ॥ अनागतविधातारः कालज्ञानविशारदाः । अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ॥ १७ ॥ जिसके मन्त्री कुलीन, धनके लोभसे फोड़े न जा सकनेवाले, सदा राजाके साथ रहनेवाले, उन्हें अच्छी बुद्धि देनेवाले, सत्पुरुष, सम्बन्ध-ज्ञानकुशल, भविष्यका भलीभाँति प्रबन्ध करनेवाले, समयके ज्ञानमें निपुण तथा बीती हुई बातके लिये शोक न करनेवाले हों, वही राजा राज्यके फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥ समदुःखसुखा यस्य सहायाः प्रियकारिणः । अर्थचिन्तापराः सत्याः स राज्यफलमश्नुते ॥ १८ ॥ जिसके सहायक राजाके सुखमें सुख और दुःखमें दुःख मानते हों, सदा उसका प्रिय करनेवाले हों और राजकीय धन कैसे बढ़े—इसकी चिन्तामें तत्पर तथा सत्यवादी हों, वह राजा राज्यका फल पाता है ॥ १८ ॥ यस्य नार्तो जनपदः संनिकर्षगतः सदा । अक्षुद्रः सत्यथालम्बी स राजा राज्यभाग्भवेत् ॥ १९ ॥ जिसका देश दुखी न हो तथा सदा समीपवर्ती बना रहे, जो स्वयं भी छोटे विचारका न होकर सदा सन्मार्गका अवलम्बन करनेवाला हो, वही राजा राज्यका भागी होता है ॥ १९ ॥ कोशाख्यपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्न रैः । आप्तैस्तुष्टैश्च सततं चीयते स नृपोत्तमः ॥ २० ॥ विश्वासपात्र, संतोषी तथा खजाना बढ़ानेका सतत प्रयत्न करनेवाले, खजांचियोंके द्वारा जिसके कोषकी सदा वृद्धि हो रही हो, वही राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः संचयतत्परैः । पात्रभूतैरलुब्धैश्च पाल्यमानं गुणी भवेत् ॥ २१ ॥ यदि लोभवश फूट न सकनेवाले, विश्वासपात्र, संग्रही, सुपात्र एवं निर्लोभ मनुष्य अन्नादि भण्डारकी रक्षामें तत्पर हों तो उसकी विशेष उन्नति होती है ॥ २१ ॥ व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदयः । दृश्यते शंखलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥ २२ ॥ जिसके नगरमें कर्मके अनुसार फलकी प्राप्तिका प्रतिपादन करनेवाले शंख-लिखित मुनिके बनाये हुए न्याय-व्यवहारका पालन होता देखा जाता है, वह राजा धर्मके फलका भागी होता है ॥ २२ ॥