महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त रहकर स्नेहके सारे बन्धनोंको लाँघ जाऊँगा। किसीके अधीन न रहकर वायुके समान सर्वत्र विचरूँगा ॥ २८ ॥ वीतरागश्चरन्नेवं तुष्टिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् । तृष्णया हि महत् पापमज्ञानादस्मि कारितः ॥ २९ ॥ इस प्रकार वीतराग होकर विचरनेसे मुझे शाश्वत संतोष प्राप्त होगा। अज्ञानवश तृष्णाने मुझसे बड़े-बड़े पाप करवाये हैं ॥ २९ ॥ कुशलाकुशलान्येके कृत्वा कर्माणि मानवाः । कार्यकारणसंश्लिष्टं स्वजनं नाम बिभ्रति ॥ ३० ॥ कुछ मनुष्य शुभाशुभ कर्म करके कार्य-कारणसे अपने साथ जुड़े हुए स्वजनोंका भरण-पोषण करते हैं ॥ आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्राणं कलेवरम् । प्रतिगृह्णाति तत् पापं कर्तुः कर्मफलं हि तत् ॥ ३१ ॥ फिर आयुके अन्तमें जीवात्मा इस प्राणशून्य शरीरको त्यागकर पहलेके किये हुए उस पापको ग्रहण करता है; क्योंकि कर्ताको ही उसके कर्मका वह फल प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ एवं संसारचक्रेऽस्मिन् व्याविद्धे रथचक्रवत् । समेति भूतग्रामोऽयं भूतग्रामेण कार्यवान् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार रथके पहियेके समान निरन्तर घूमते हुए इस संसारचक्रमें आकर जीवोंका यह समुदाय कार्यवश अन्य प्राणियोंसे मिलता है ॥ ३२ ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् । अपारमिव चास्वस्थं संसारं त्यजतः सुखम् ॥ ३३ ॥ इस संसारमें जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदनाओंका आक्रमण होता ही रहता है, जिससे यहाँका जीवन कभी स्वस्थ नहीं रहता। जो अपार-सा प्रतीत होनेवाले इस संसारको त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ॥ ३३ ॥ दिवः पतत्सु देवेषु स्थानेभ्यश्च महर्षिषु । को हि नाम भवेनार्थी भवेत् कारणतत्त्ववित् ॥ ३४ ॥ जब देवता भी स्वर्गसे नीचे गिरते हैं और महर्षि भी अपने-अपने स्थानसे भ्रष्ट हो जाते हैं, तब कारण-तत्त्वको जाननेवाला कौन मनुष्य इस जन्म-मरणरूप संसारसे कोई प्रयोजन रखेगा ॥ ३४ ॥ कृत्वा हि विविधं कर्म तत्तद् विविधलक्षणम् । पार्थिवैर्नृपतिः स्वल्पैः कारणैरेव बध्यते ॥ ३५ ॥ भाँति-भाँतिके भिन्न-भिन्न कर्म करके विख्यात हुआ राजा भी किन्हीं छोटे-मोटे कारणोंसे ही दूसरे राजाओंद्वारा मार डाला जाता है ॥ ३५ ॥ तस्मात् प्रज्ञामृतमिदं चिरान्मां प्रत्युपस्थितम् ।