भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ॥ २२ ॥ एककालं चरन् भैक्ष्यं त्रीनथ द्वे च पञ्च वा । स्नेहपाशं विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ॥ २३ ॥ जब घरोंमेंसे धुआँ निकलना बंद हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो, घरके सब लोग खा-पी चुके हों, परोसी हुई थालीको इधर-उधर ले जानेका काम समाप्त हो गया हो और भिखमंगे भिक्षा लेकर लौट गये हों, ऐसे समयमें मैं एक ही वक्त भिक्षाके लिये दो, तीन या पाँच घरोंतक जाया करूँगा। सब ओरसे स्नेहका बन्धन तोड़कर इस पृथ्वीपर विचरता रहूँगा ॥ २२-२३ ॥ अलाभे सति वा लाभे समदर्शी महातपाः । न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् ॥ २४ ॥ कुछ मिले या न मिले, दोनों ही अवस्थाओंमें मेरी दृष्टि समान होगी। मैं महान् तपमें संलग्न रहकर ऐसा कोई आचरण नहीं करूँगा, जिसे जीने या मरनेकी इच्छावाले लोग करते हैं ॥ २४ ॥ जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन्न च द्विषन् । वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः ॥ २५ ॥ नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः । न तो जीवनका अभिनन्दन करूँगा, न मृत्युसे द्वेष। यदि एक मनुष्य मेरी एक बाँहको बसूलेसे काटता हो और दूसरा दूसरी बाँहको चन्दनमिश्रित जलसे सींचता हो तो न पहलेका अमंगल सोचूँगा और न दूसरेकी मंगल-कामना करूँगा। उन दोनोंके प्रति समान भाव रखूँगा ॥ याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । सर्वास्ताः समभित्यज्य निमेषादिव्यवस्थितः ॥ २६ ॥ जीवित पुरुषके द्वारा जो कोई भी अभ्युदयकारी कर्म किये जा सकते हैं, उन सबका परित्याग करके केवल शरीर-निर्वाहके लिये पलकोंके खोलने-मींचने या खाने-पीने आदिके कार्यमें ही प्रवृत्त हो सकूँगा ॥ २६ ॥ तेषु नित्यमसक्तश्च त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । सुपरित्यक्तसंकल्पः सुनिर्रिक्तात्मकल्मषः ॥ २७ ॥ इन सब कार्योंमें भी आसक्त नहीं होऊँगा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारोंसे उपरत होकर मनको संकल्पशून्य करके अन्तःकरणका सारा मल धो डालूँगा ॥ २७ ॥ विमुक्तः सर्वसंगेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ॥ २८ ॥