भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 76

करूँगा ।। १४ ।। आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृतिः । अकुर्वाणः परैः काञ्चित् संविदं जातु कैरपि ।। १५ ।। आत्माके चिन्तनमें ही सुखका अनुभव करूँगा, मनको सदा प्रसन्न रखूँगा, कभी किसी दूसरेके साथ कोई बातचीत नहीं करूँगा, गूँगों, अंधों और बहरोंके समान न किसीसे कुछ कहूँगा, न किसीको देखूँगा और न किसीकी सुनूँगा ।। १५ ।। जङ्गमाजङ्गमान् सर्वानविहिंसंश्चतुर्विधान् । प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ।। १६ ।। चार प्रकारके समस्त चराचर प्राणियोंमेंसे किसीकी हिंसा नहीं करूँगा। अपने-अपने धर्ममें स्थित हुई समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखूँगा ।। १६ ।। न चाप्यवहसन् कञ्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुटीः क्वचित् । प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रियसुसंयतः ।। १७ ।। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न किसीके प्रति भौंहोंको ही टेढ़ी करूँगा। सदा मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी और मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंको पूर्णतः संयममें रखूँगा ।। १७ ।। अपृच्छन् कस्यचिन्मार्गं प्रव्रजन्नेव केनचित् । न देशं न दिशं काञ्चिद् गन्तुमिच्छन् विशेषतः ।। १८ ।। किसी भी मार्गसे चलता रहूँगा और कभी किसीसे रास्ता नहीं पूछूँगा। किसी खास स्थान या दिशाकी ओर जानेकी इच्छा नहीं रखूँगा ।। १८ ।। गमने निरपेक्षश्च पश्चादनवलोकयन् । ऋजुः प्रणिहितो गच्छंस्त्रसं स्थावरवर्जकः ।। १९ ।। कहीं भी मेरे जानेका कोई विशेष उद्देश्य नहीं होगा। न आगे जानेकी उत्सुकता होगी, न पीछे फिरकर देखूँगा। सरल भावसे रहूँगा। मेरी दृष्टि अन्तर्मुखी होगी। स्थावर-जंगम जीवोंको बचाता हुआ आगे चलता रहूँगा ।। १९ ।। स्वभावस्तु प्रयात्यग्रे प्रभवन्त्यशनान्यपि । द्वन्द्वानि च विरुद्धानि तानि सर्वाण्यचिन्तयन् ।। २० ।। स्वभाव आगे-आगे चलता है, भोजन भी अपने-आप प्रकट हो जाते हैं, सर्दी-गर्मी आदि जो परस्पर विरोधी द्वन्द्व हैं; वे सब आते-जाते रहते हैं, अतः इन सबकी चिन्ता छोड़ दूँगा ।। २० ।। अल्पं वास्वादु वा भोज्यं पूर्वालाभेन जातुचित् । अन्येष्वपि चरँल्लाभमलाभे सप्त पूरयन् ।। २१ ।। भिक्षा थोड़ी मिली या स्वादहीन मिली, इसका विचार न करके उसे पा लूँगा। यदि कभी एक घरसे भिक्षा नहीं मिली तो दूसरे घरोंमें भी जाऊँगा। मिल गया तो ठीक है, न मिलनेकी दशामें क्रमशः सात घरोंमें जाऊँगा, आठवेंमें नहीं जाऊँगा ।। २१ ।।

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