भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

मुदितानामरण्येषु वसतां मृगपक्षिणाम् ।। ७ ।। वनमें प्रसन्नतापूर्वक निवास करनेवाले पशु-पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोली, जो मन और कानोंको सुख देनेवाली होगी, नित्य सुनता रहूँगा ।। ७ ।।

आजिघ्रन् पेशलान् गन्धान् फुल्लानां वृक्षवीरुधाम् । नानारूपान् वने पश्यन् रमणीयान् वनौकसः ।। ८ ।। वनमें खिले हुए वृक्षों और लताओंकी मनोहर सुगन्ध सूँघता हुआ अनेक रूपवाले सुन्दर वनवासियोंको देखा करूँगा ।। ८ ।।

वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किंपुनर्ग्रामवासिनाम् ।। ९ ।। वहाँ वानप्रस्थ महात्माओं तथा ऋषिकुलवासी ब्रह्मचारी ऋषि-मुनियोंका भी दर्शन होगा। मैं किसी वनवासीका भी अप्रिय नहीं करूँगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ९ ।।

एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। १० ।। एकान्तमें रहकर आध्यात्मिक तत्त्वका विचार किया करूँगा और कच्चा-पक्का जैसा भी फल मिल जायगा, उसीको खाकर जीवन-निर्वाह करूँगा। जंगली फल-मूल, मधुर वाणी और जलके द्वारा देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करता रहूँगा ।। १० ।।

एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । सेवमानः प्रतीक्षिष्ये देहस्यास्य समापनम् ।। ११ ।। इस प्रकार वनवासी मुनियोंके लिये शास्त्रमें बताये हुए कठोर-से-कठोर नियमोंका पालन करता हुआ इस शरीरकी आयु समाप्त होनेकी बाट देखता रहूँगा ।। ११ ।।

अथवैकोऽहमेकाहमेकैकस्मिन् वनस्पतौ । चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ।। १२ ।। अथवा मैं मूँड मुड़ाकर मननशील संन्यासी हो जाऊँगा और एक-एक दिन एक-एक वृक्षसे भिक्षा माँगकर अपने शरीरको सुखाता रहूँगा ।। १२ ।।

पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः । वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ।। १३ ।। शरीरपर धूल पड़ी होगी और सूने घरोंमें मेरा निवास होगा अथवा किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़में ही पड़ा रहूँगा। प्रिय और अप्रियका सारा विचार छोड़ दूँगा ।। १३ ।।

न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।। १४ ।। किसीके लिये न शोक करूँगा न हर्ष। निन्दा और स्तुतिको समान समझूँगा। आशा और ममताको त्यागकर निर्द्वन्द्व हो जाऊँगा तथा कभी किसी वस्तुका संग्रह नहीं