महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मुदितानामरण्येषु वसतां मृगपक्षिणाम् ।। ७ ।। वनमें प्रसन्नतापूर्वक निवास करनेवाले पशु-पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोली, जो मन और कानोंको सुख देनेवाली होगी, नित्य सुनता रहूँगा ।। ७ ।।
आजिघ्रन् पेशलान् गन्धान् फुल्लानां वृक्षवीरुधाम् । नानारूपान् वने पश्यन् रमणीयान् वनौकसः ।। ८ ।। वनमें खिले हुए वृक्षों और लताओंकी मनोहर सुगन्ध सूँघता हुआ अनेक रूपवाले सुन्दर वनवासियोंको देखा करूँगा ।। ८ ।।
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किंपुनर्ग्रामवासिनाम् ।। ९ ।। वहाँ वानप्रस्थ महात्माओं तथा ऋषिकुलवासी ब्रह्मचारी ऋषि-मुनियोंका भी दर्शन होगा। मैं किसी वनवासीका भी अप्रिय नहीं करूँगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ९ ।।
एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। १० ।। एकान्तमें रहकर आध्यात्मिक तत्त्वका विचार किया करूँगा और कच्चा-पक्का जैसा भी फल मिल जायगा, उसीको खाकर जीवन-निर्वाह करूँगा। जंगली फल-मूल, मधुर वाणी और जलके द्वारा देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करता रहूँगा ।। १० ।।
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । सेवमानः प्रतीक्षिष्ये देहस्यास्य समापनम् ।। ११ ।। इस प्रकार वनवासी मुनियोंके लिये शास्त्रमें बताये हुए कठोर-से-कठोर नियमोंका पालन करता हुआ इस शरीरकी आयु समाप्त होनेकी बाट देखता रहूँगा ।। ११ ।।
अथवैकोऽहमेकाहमेकैकस्मिन् वनस्पतौ । चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ।। १२ ।। अथवा मैं मूँड मुड़ाकर मननशील संन्यासी हो जाऊँगा और एक-एक दिन एक-एक वृक्षसे भिक्षा माँगकर अपने शरीरको सुखाता रहूँगा ।। १२ ।।
पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः । वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ।। १३ ।। शरीरपर धूल पड़ी होगी और सूने घरोंमें मेरा निवास होगा अथवा किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़में ही पड़ा रहूँगा। प्रिय और अप्रियका सारा विचार छोड़ दूँगा ।। १३ ।।
न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।। १४ ।। किसीके लिये न शोक करूँगा न हर्ष। निन्दा और स्तुतिको समान समझूँगा। आशा और ममताको त्यागकर निर्द्वन्द्व हो जाऊँगा तथा कभी किसी वस्तुका संग्रह नहीं
करूँगा ।। १४ ।। आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृतिः । अकुर्वाणः परैः काञ्चित् संविदं जातु कैरपि ।। १५ ।। आत्माके चिन्तनमें ही सुखका अनुभव करूँगा, मनको सदा प्रसन्न रखूँगा, कभी किसी दूसरेके साथ कोई बातचीत नहीं करूँगा, गूँगों, अंधों और बहरोंके समान न किसीसे कुछ कहूँगा, न किसीको देखूँगा और न किसीकी सुनूँगा ।। १५ ।। जङ्गमाजङ्गमान् सर्वानविहिंसंश्चतुर्विधान् । प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ।। १६ ।। चार प्रकारके समस्त चराचर प्राणियोंमेंसे किसीकी हिंसा नहीं करूँगा। अपने-अपने धर्ममें स्थित हुई समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखूँगा ।। १६ ।। न चाप्यवहसन् कञ्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुटीः क्वचित् । प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रियसुसंयतः ।। १७ ।। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न किसीके प्रति भौंहोंको ही टेढ़ी करूँगा। सदा मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी और मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंको पूर्णतः संयममें रखूँगा ।। १७ ।। अपृच्छन् कस्यचिन्मार्गं प्रव्रजन्नेव केनचित् । न देशं न दिशं काञ्चिद् गन्तुमिच्छन् विशेषतः ।। १८ ।। किसी भी मार्गसे चलता रहूँगा और कभी किसीसे रास्ता नहीं पूछूँगा। किसी खास स्थान या दिशाकी ओर जानेकी इच्छा नहीं रखूँगा ।। १८ ।। गमने निरपेक्षश्च पश्चादनवलोकयन् । ऋजुः प्रणिहितो गच्छंस्त्रसं स्थावरवर्जकः ।। १९ ।। कहीं भी मेरे जानेका कोई विशेष उद्देश्य नहीं होगा। न आगे जानेकी उत्सुकता होगी, न पीछे फिरकर देखूँगा। सरल भावसे रहूँगा। मेरी दृष्टि अन्तर्मुखी होगी। स्थावर-जंगम जीवोंको बचाता हुआ आगे चलता रहूँगा ।। १९ ।। स्वभावस्तु प्रयात्यग्रे प्रभवन्त्यशनान्यपि । द्वन्द्वानि च विरुद्धानि तानि सर्वाण्यचिन्तयन् ।। २० ।। स्वभाव आगे-आगे चलता है, भोजन भी अपने-आप प्रकट हो जाते हैं, सर्दी-गर्मी आदि जो परस्पर विरोधी द्वन्द्व हैं; वे सब आते-जाते रहते हैं, अतः इन सबकी चिन्ता छोड़ दूँगा ।। २० ।। अल्पं वास्वादु वा भोज्यं पूर्वालाभेन जातुचित् । अन्येष्वपि चरँल्लाभमलाभे सप्त पूरयन् ।। २१ ।। भिक्षा थोड़ी मिली या स्वादहीन मिली, इसका विचार न करके उसे पा लूँगा। यदि कभी एक घरसे भिक्षा नहीं मिली तो दूसरे घरोंमें भी जाऊँगा। मिल गया तो ठीक है, न मिलनेकी दशामें क्रमशः सात घरोंमें जाऊँगा, आठवेंमें नहीं जाऊँगा ।। २१ ।।
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ॥ २२ ॥ एककालं चरन् भैक्ष्यं त्रीनथ द्वे च पञ्च वा । स्नेहपाशं विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ॥ २३ ॥ जब घरोंमेंसे धुआँ निकलना बंद हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो, घरके सब लोग खा-पी चुके हों, परोसी हुई थालीको इधर-उधर ले जानेका काम समाप्त हो गया हो और भिखमंगे भिक्षा लेकर लौट गये हों, ऐसे समयमें मैं एक ही वक्त भिक्षाके लिये दो, तीन या पाँच घरोंतक जाया करूँगा। सब ओरसे स्नेहका बन्धन तोड़कर इस पृथ्वीपर विचरता रहूँगा ॥ २२-२३ ॥ अलाभे सति वा लाभे समदर्शी महातपाः । न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् ॥ २४ ॥ कुछ मिले या न मिले, दोनों ही अवस्थाओंमें मेरी दृष्टि समान होगी। मैं महान् तपमें संलग्न रहकर ऐसा कोई आचरण नहीं करूँगा, जिसे जीने या मरनेकी इच्छावाले लोग करते हैं ॥ २४ ॥ जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन्न च द्विषन् । वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः ॥ २५ ॥ नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः । न तो जीवनका अभिनन्दन करूँगा, न मृत्युसे द्वेष। यदि एक मनुष्य मेरी एक बाँहको बसूलेसे काटता हो और दूसरा दूसरी बाँहको चन्दनमिश्रित जलसे सींचता हो तो न पहलेका अमंगल सोचूँगा और न दूसरेकी मंगल-कामना करूँगा। उन दोनोंके प्रति समान भाव रखूँगा ॥ याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । सर्वास्ताः समभित्यज्य निमेषादिव्यवस्थितः ॥ २६ ॥ जीवित पुरुषके द्वारा जो कोई भी अभ्युदयकारी कर्म किये जा सकते हैं, उन सबका परित्याग करके केवल शरीर-निर्वाहके लिये पलकोंके खोलने-मींचने या खाने-पीने आदिके कार्यमें ही प्रवृत्त हो सकूँगा ॥ २६ ॥ तेषु नित्यमसक्तश्च त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । सुपरित्यक्तसंकल्पः सुनिर्रिक्तात्मकल्मषः ॥ २७ ॥ इन सब कार्योंमें भी आसक्त नहीं होऊँगा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारोंसे उपरत होकर मनको संकल्पशून्य करके अन्तःकरणका सारा मल धो डालूँगा ॥ २७ ॥ विमुक्तः सर्वसंगेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ॥ २८ ॥
सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त रहकर स्नेहके सारे बन्धनोंको लाँघ जाऊँगा। किसीके अधीन न रहकर वायुके समान सर्वत्र विचरूँगा ॥ २८ ॥ वीतरागश्चरन्नेवं तुष्टिं प्राप्स्यामि शाश्वतीम् । तृष्णया हि महत् पापमज्ञानादस्मि कारितः ॥ २९ ॥ इस प्रकार वीतराग होकर विचरनेसे मुझे शाश्वत संतोष प्राप्त होगा। अज्ञानवश तृष्णाने मुझसे बड़े-बड़े पाप करवाये हैं ॥ २९ ॥ कुशलाकुशलान्येके कृत्वा कर्माणि मानवाः । कार्यकारणसंश्लिष्टं स्वजनं नाम बिभ्रति ॥ ३० ॥ कुछ मनुष्य शुभाशुभ कर्म करके कार्य-कारणसे अपने साथ जुड़े हुए स्वजनोंका भरण-पोषण करते हैं ॥ आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्राणं कलेवरम् । प्रतिगृह्णाति तत् पापं कर्तुः कर्मफलं हि तत् ॥ ३१ ॥ फिर आयुके अन्तमें जीवात्मा इस प्राणशून्य शरीरको त्यागकर पहलेके किये हुए उस पापको ग्रहण करता है; क्योंकि कर्ताको ही उसके कर्मका वह फल प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ एवं संसारचक्रेऽस्मिन् व्याविद्धे रथचक्रवत् । समेति भूतग्रामोऽयं भूतग्रामेण कार्यवान् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार रथके पहियेके समान निरन्तर घूमते हुए इस संसारचक्रमें आकर जीवोंका यह समुदाय कार्यवश अन्य प्राणियोंसे मिलता है ॥ ३२ ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् । अपारमिव चास्वस्थं संसारं त्यजतः सुखम् ॥ ३३ ॥ इस संसारमें जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदनाओंका आक्रमण होता ही रहता है, जिससे यहाँका जीवन कभी स्वस्थ नहीं रहता। जो अपार-सा प्रतीत होनेवाले इस संसारको त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ॥ ३३ ॥ दिवः पतत्सु देवेषु स्थानेभ्यश्च महर्षिषु । को हि नाम भवेनार्थी भवेत् कारणतत्त्ववित् ॥ ३४ ॥ जब देवता भी स्वर्गसे नीचे गिरते हैं और महर्षि भी अपने-अपने स्थानसे भ्रष्ट हो जाते हैं, तब कारण-तत्त्वको जाननेवाला कौन मनुष्य इस जन्म-मरणरूप संसारसे कोई प्रयोजन रखेगा ॥ ३४ ॥ कृत्वा हि विविधं कर्म तत्तद् विविधलक्षणम् । पार्थिवैर्नृपतिः स्वल्पैः कारणैरेव बध्यते ॥ ३५ ॥ भाँति-भाँतिके भिन्न-भिन्न कर्म करके विख्यात हुआ राजा भी किन्हीं छोटे-मोटे कारणोंसे ही दूसरे राजाओंद्वारा मार डाला जाता है ॥ ३५ ॥ तस्मात् प्रज्ञामृतमिदं चिरान्मां प्रत्युपस्थितम् ।
तत् प्राप्य प्रार्थये स्थानमव्ययं शाश्वतं ध्रुवम् ।। ३६ ।। आज दीर्घकालके पश्चात् मुझे यह विवेकरूपी अमृत प्राप्त हुआ है। इसे पाकर मैं अक्षय, अविकारी एवं सनातन पदको प्राप्त करना चाहता हूँ ।। ३६ ।।
एतया संततं धृत्या चरन्नेवंप्रकारया । जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरभिद्रुतम् । देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः ।। ३७ ।। अतः इस पूर्वोक्त धारणाके द्वारा निरन्तर विचरता हुआ मैं निर्भय मार्गका आश्रय ले जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और वेदनाओंसे आक्रान्त हुए इस शरीरको अलग रख दूँगा ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये नवमोऽध्यायः ।। ९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका वाक्यविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।
दशमोऽध्यायः
भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना
भीम उवाच
श्रोत्रियस्येव ते राजन् मन्दकस्याविपश्चितः ।
अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी ॥ १ ॥
**भीमसेन बोले—**राजन्! जैसे मन्द और अर्थज्ञानसे शून्य श्रोत्रियकी बुद्धि केवल मन्त्रपाठद्वारा मारी जाती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि भी तात्त्विक अर्थको देखने या समझनेवाली नहीं है ॥ १ ॥
आलस्ये कृतचित्तस्य राजधर्मानसूयतः ।
विनाशे धार्तराष्ट्राणां किं फलं भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! यदि राजधर्मकी निन्दा करते हुए आपने आलस्यपूर्ण जीवन बितानेका ही निश्चय किया था तो धृतराष्ट्रके पुत्रोंका विनाश करानेसे क्या फल मिला? ॥ २ ॥
क्षमानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं न विद्यते ।
क्षात्रमाचरतो मार्गमपि बन्धोस्त्वदन्तरे ॥ ३ ॥
क्षत्रियोचित मार्गपर चलनेवाले पुरुषके हृदयमें अपने भाईपर भी क्षमा, दया, करुणा और कोमलताका भाव नहीं रह जाता; फिर आपके हृदयमें यह सब क्यों है? ॥ ३ ॥
यदिमां भवतो बुद्धिं विद्याम वयमीदृशीम् ।
शस्त्रं नैव ग्रहीष्यामो न वधिष्याम कंचन ॥ ४ ॥
यदि हम पहले ही जान लेते कि आपका विचार इस तरहका है तो हम हथियार नहीं उठाते और न किसीका वध ही करते ॥ ४ ॥
भैक्ष्यमेवाचरिष्याम शरीरस्याविमोक्षणात् ।
न चेदं दारुणं युद्धमभविष्यन्महीक्षिताम् ॥ ५ ॥
हम भी आपकी ही तरह शरीर छूटनेतक भीख माँगकर ही जीवन-निर्वाह करते। फिर तो राजाओंमें यह भयंकर युद्ध होता ही नहीं ॥ ५ ॥
प्राणस्यान्नमिदं सर्वमिति वै कवयो विदुः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ ६ ॥
विद्वान् पुरुष कहते हैं कि यह सब कुछ प्राणका अन्न है, स्थावर और जङ्गम सारा जगत् प्राणका भोजन है ॥ ६ ॥
आददानस्य चेद् राज्यं ये केचित् परिपन्थिनः ।
हन्तव्यास्त इति प्राज्ञाः क्षत्रधर्मविदो विदुः ॥ ७ ॥
क्षत्रिय-धर्मके ज्ञाता विद्वान् पुरुष यह जानते और बताते हैं कि अपना राज्य ग्रहण करते समय जो कोई भी उसमें बाधक या विरोधी खड़े हों, उन्हें मार डालना चाहिये ॥ ७ ॥
ते सदोषा हतास्माभी राज्यस्य परिपन्थिनः ।
तान् हत्वा भुङ्क्ष्व धर्मेण युधिष्ठिर महीमिमाम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग हमारे राज्यके बाधक या लुटेरे थे, वे सभी अपराधी ही थे; अतः हमने उन्हें मार डाला। उन्हें मारकर धर्मतः प्राप्त हुई इस पृथ्वीका आप उपभोग कीजिये ॥ ८ ॥
यथा हि पुरुषः खात्वा कूपमप्राप्य चोदकम् ।
पङ्कदिग्धो निवर्तेत कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ ९ ॥
जैसे कोई मनुष्य परिश्रम करके कुँआ खोदे और वहाँ जल न मिलनेपर देहमें कीचड़ लपेटे हुए वहाँसे निराश लौट आये, उसी प्रकार हमारा किया-कराया यह सारा पराक्रम व्यर्थ होना चाहता है ॥ ९ ॥
यथाऽऽरुह्य महावृक्षमपहृत्य ततो मधु ।
अप्राश्य निधनं गच्छेत् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १० ॥
जैसे कोई विशाल वृक्षपर आरूढ़ हो वहाँसे मधु उतार लाये परंतु उसे खानेके पूर्व ही उसकी मृत्यु हो जाय; हमारा यह प्रयत्न भी वैसा ही हो रहा है ॥ १० ॥
यथा महान्तमध्वानमाशया पुरुषः पतन् ।
स निराशो निवर्तेत कर्मैतन्नस्तथोपमम् ॥ ११ ॥
जैसे कोई मनुष्य मनमें कोई आशा लेकर बहुत बड़ा मार्ग तय करे और वहाँ पहुँचनेपर निराश लौटे, हमारा यह कार्य भी उसी तरह निष्फल हो रहा है ॥ ११ ॥
यथा शत्रून् घातयित्वा पुरुषः कुरुनन्दन ।
आत्मानं घातयेत् पश्चात् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! जैसे कोई मनुष्य शत्रुओंका वध करनेके पश्चात् अपनी भी हत्या कर डाले, हमारा यह कर्म भी वैसा ही है ॥ १२ ॥
यथान्नं क्षुधितो लब्ध्वा न भुञ्जीयाद् यदृच्छया ।
कामीव कामिनीं लब्ध्वा कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १३ ॥
जैसे भूखा मनुष्य भोजन और कामी पुरुष कामिनीको पाकर दैववश उसका उपभोग न करे, हमारा यह कर्म भी वैसा ही निष्फल हो रहा है ॥ १३ ॥
वयमेवात्र गर्ह्या हि यद् वयं मन्दचेतसम् ।
त्वां राजन्ननुगच्छामो ज्येष्ठोऽयमिति भारत ॥ १४ ॥
भरतवंशी नरेश! हमलोग ही यहाँ निन्दाके पात्र हैं कि आप-जैसे अल्पबुद्धि पुरुषको बड़ा भाई समझकर आपके पीछे-पीछे चलते हैं ॥ १४ ॥
वयं हि बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । क्लीबस्य वाक्ये तिष्ठामो यथैवाशक्तयस्तथा ॥ १५ ॥ हम बाहुबलसे सम्पन्न, अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् और मनस्वी हैं तो भी असमर्थ पुरुषोंके समान एक कायर भाईकी आज्ञामें रहते हैं ॥ १५ ॥
अगतीकगतीनस्मान् नष्टार्थानर्थसिद्धये । कथं वै नानुपश्येयुर्जनाः पश्यत यादृशम् ॥ १६ ॥ हमलोग पहले अशरण मनुष्योंको शरण देनेवाले थे; किंतु अब हमारा ही अर्थ नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें अर्थसिद्धिके लिये हमारा आश्रय लेनेवाले लोग हमारी इस दुर्बलतापर कैसे दृष्टि नहीं डालेंगे? बन्धुओ! मेरा कथन कैसा है? इसपर विचार करो ॥ १६ ॥
आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते । जरयाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यसितेन वा ॥ १७ ॥ शास्त्रका उपदेश यह है कि आपत्तिकालमें या बुढ़ापेसे जर्जर हो जानेपर अथवा शत्रुओंद्धारा धन-सम्पत्तिसे वञ्चित कर दिये जानेपर मनुष्यको संन्यास ग्रहण करना चाहिये ॥ १७ ॥
तस्मादिह कृतप्रज्ञास्त्यागं न परिचक्षते । धर्मव्यतिक्रमं चैव मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ॥ १८ ॥ अतः (जब कि हमारे ऊपर पूर्वोक्त संकट नहीं आया है) विद्वान् पुरुष ऐसे अवसरमें त्याग या संन्यासकी प्रशंसा नहीं करते हैं। सूक्ष्मदर्शी पुरुष तो ऐसे समयमें क्षत्रियके लिये संन्यास लेना उलटे धर्मका उल्लंघन मानते हैं ॥ १८ ॥
कथं तस्मात् समुत्पन्नास्तन्निष्ठास्तदुपाश्रयाः । तदेव निन्दां भाषेषुर्धाता तत्र न गर्ह्यते ॥ १९ ॥ इसलिये जिनकी क्षात्रधर्मके लिये उत्पत्ति हुई है, जो क्षात्रधर्ममें ही तत्पर रहते हैं, तथा क्षात्रधर्मका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे क्षत्रिय स्वयं ही उस क्षात्रधर्मकी निन्दा कैसे कर सकते हैं? इसके लिये उस विधाताकी ही निन्दा क्यों न की जाय, जिन्होंने क्षत्रियोंके लिये युद्धधर्मका विधान किया है ॥ १९ ॥
श्रिया विहीनैर्धनैर्नास्तिकैः सम्प्रवर्तितम् । वेदवादस्य विज्ञानं सत्याभासमिवानृतम् ॥ २० ॥ श्रीहीन, निर्धन एवं नास्तिकोंने वेदके अर्थवादवाक्यों द्वारा प्रतिपादित विज्ञानका आश्रय ले सत्य-सा प्रतीत होनेवाले मिथ्या मतका प्रचार किया है (वैसे वचनोंद्वारा क्षत्रियका संन्यासमें अधिकार नहीं सिद्ध होता है) ॥ २० ॥
शक्यं तु मौनमास्थाय बिभ्रताऽऽत्मानमात्मना । धर्मच्छद्म समास्थाय च्यवितुं न तु जीवितुम् ॥ २१ ॥
धर्मका बहाना लेकर अपनेद्वारा केवल अपना पेट पालते हुए मौनी बाबा बनकर बैठ जानेसे कर्तव्यसे भ्रष्ट होना ही सम्भव है, जीवनको सार्थक बनाना नहीं ॥ २१ ॥
शक्यं पुनररण्येषु सुखमेकेन जीवितुम् ।
अबिभ्रता पुत्रपौत्रान् देवर्षीनतिथीन् पितॄन् ॥ २२ ॥
जो पुत्रों और पौत्रोंके पालनमें असमर्थ हो, देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको तृप्त न कर सकता हो और अतिथियोंको भोजन देनेकी भी शक्ति न रखता हो, ऐसा मनुष्य ही अकेला जंगलोंमें रहकर सुखसे जीवन बिता सकता है (आप-जैसे शक्तिशाली पुरुषोंका यह काम नहीं है) ॥ २२ ॥
नेमे मृगाः स्वर्गजितो न वराहा न पक्षिणः ।
अथान्येन प्रकारेण पुण्यमाहुर्न तं जनाः ॥ २३ ॥
सदा ही वनमें रहनेपर भी न तो ये मृग स्वर्गलोकपर अधिकार पा सके हैं, न सूअर और पक्षी ही। पुण्यकी प्राप्ति तो अन्य प्रकारसे ही बतलायी गयी है। श्रेष्ठ पुरुष केवल वनवासको ही पुण्यकारक नहीं मानते ॥ २३ ॥
यदि संन्यासतः सिद्धिं राजा कश्चिदवाप्नुयात् ।
पर्वताश्च द्रुमाश्चैव क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २४ ॥
यदि कोई राजा संन्याससे सिद्धि प्राप्त कर ले, तब तो पर्वत और वृक्ष बहुत जल्दी सिद्धि पा सकते हैं ॥ २४ ॥
एते हि नित्यसंन्यासा दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ।
अपरिग्रहवन्तश्च सततं ब्रह्मचारिणः ॥ २५ ॥
क्योंकि ये नित्य संन्यासी, उपद्रवशून्य, परिग्रहरहित तथा निरन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले देखे जाते हैं ॥ २५ ॥
अथ चेदात्मभाग्येषु नान्येषां सिद्धिमश्नुते ।
तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥ २६ ॥
यदि अपने भाग्यमें दूसरोंके कर्मोंसे प्राप्त हुई सिद्धि नहीं आती, तब तो सभीको कर्म ही करना चाहिये। अकर्मण्य पुरुषको कभी कोई सिद्धि नहीं मिलती ॥ २६ ॥
औदकाः सृष्टयश्चैव जन्तवः सिद्धिमाप्नुयुः ।
तेषामात्मैव भर्त्तव्यो नान्यः कश्चन विद्यते ॥ २७ ॥
(यदि अपने शरीरमात्रका भरण-पोषण करनेसे सिद्धि मिलती हो, तब तो) जलमें रहनेवाले जीवों तथा स्थावर प्राणियोंको भी सिद्धि प्राप्त कर लेनी चाहिये; क्योंकि उन्हें केवल अपना ही भरण-पोषण करना रहता है। उनके पास दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जिसके भरण-पोषणका भार वे उठाते हों ॥ २७ ॥
अवेक्षस्व यथा स्वैः स्वैः कर्मभिर्व्यापृतं जगत् ।
तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥ २८ ॥
देखिये और विचार कीजिये कि सारा संसार किस तरह अपने कर्मोंमें लगा हुआ है; अतः आपको भी क्षत्रियोचित कर्तव्यका ही पालन करना चाहिये। जो कर्मोंको छोड़ बैठता है, उसे कभी सिद्धि नहीं मिलती ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीमवाक्ये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीमसेनका वचनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना
अर्जुन उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
तापसैः सह संवादं शक्रस्य भरतर्षभ॥ १॥
**अर्जुनने कहा—**भरतश्रेष्ठ! इसी विषयमें जानकार लोग तापसोंके साथ जो इन्द्रका संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं॥ १॥
केचिद् गृहान् परित्यज्य वनमभ्यागमन् द्विजाः।
अजातश्मश्रवो मन्दाः कुले जाताः प्रवव्रजुः॥ २॥
एक समय कुछ मन्दबुद्धि कुलीन ब्राह्मण-बालक घरको छोड़कर वनमें चले आये। अभी उन्हें मूँछ-दाढ़ीतक नहीं आयी थी, उसी अवस्थामें उन्होंने घर त्याग दिया॥ २॥
धर्मोऽयमिति मन्वानाः समृद्धा ब्रह्मचारिणः।
त्यक्त्वा भ्रातृन् पितॄंश्चैव तानिन्द्रोऽन्वकृपायत॥ ३॥
यद्यपि वे सब-के-सब धनी थे, तथापि भाई-बन्धु और माता-पिताको छोड़कर इसीको धर्म मानते हुए वनमें आकर ब्रह्मचर्यका पालन करने लगे। एक दिन इन्द्रदेवने उनपर कृपा की॥ ३॥
तानाबभाषे भगवान् पक्षी भूत्वा हिरण्मयः।
सुदुष्करं मनुष्यैश्च यत् कृतं विघसाशिभिः॥ ४॥
पुण्यं भवति कर्मेदं प्रशस्तं चैव जीवितम्।
सिद्धार्थास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ता धर्मपरायणाः॥ ५॥
भगवान् इन्द्र सुवर्णमय पक्षीका रूप धारण करके वहाँ आये और उनसे इस प्रकार कहने लगे—'यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंने जो कर्म किया है, वह दूसरोंसे होना अत्यन्त कठिन है। उनका यह कर्म बड़ा पवित्र और जीवन बहुत उत्तम है। वे धर्मपरायण पुरुष सफलमनोरथ हो श्रेष्ठ गतिको प्राप्त हुए हैं'॥ ४-५॥
ऋषय ऊचुः
अहो बतायं शकुनिर्विघसाशान् प्रशंसति।
अस्मान् नूनमयं शास्ति वयं च विघसाशिनः॥ ६॥
**ऋषि बोले—**अहो! यह पक्षी तो विघसाशी (यज्ञशेष अन्न भोजन करनेवाले) पुरुषोंकी प्रशंसा करता है। निश्चय ही यह हमलोगोंकी बड़ाई करता है; क्योंकि यहाँ हमलोग ही
विघसाशी हैं ।। ६ ।।
शकुनिरुवाच
नाहं युष्मान् प्रशंसामि पंकदिग्धान् रजस्वलान् ।
उच्छिष्टभोजिनो मन्दानन्ये वै विघसाशिनः ।। ७ ।।
**उस पक्षीने कहा—**अरे! देहमें कीचड़ लपेटे और धूल पोते हुए जूठन खानेवाले तुम-जैसे मूर्खोंकी मैं प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ। विघसाशी तो दूसरे ही होते हैं ।।
ऋषय ऊचुः
इदं श्रेयः परमिति वयमेवाभ्युपास्महे ।
शकुने ब्रूहि यच्छ्रेयो भृशं ते श्रद्दधामहे ।। ८ ।।
**ऋषि बोले—**पक्षी! यही श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी साधन है, ऐसा समझकर ही हम इस मार्गपर चल रहे हैं। तुम्हारी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ धर्म हो, उसे तुम्हीं बताओ। हम तुम्हारी बातपर अधिक श्रद्धा करते हैं ।। ८ ।।
शकुनिरुवाच
यदि मां नाभिशंकध्वं विभज्यात्मानमात्मना ।
ततोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं हितं वचः ।। ९ ।।
**पक्षीने कहा—**यदि आपलोग मुझपर संदेह न करें तो मैं स्वयं ही अपने आपको वक्ताके रूपमें विभक्त करके आपलोगोंको यथावत्रूपसे हितकी बात बताऊँगा ।। ९ ।।
ऋषय ऊचुः
शृणुमस्ते वचस्तात पन्थानो विदितास्तव ।
नियोगे चैव धर्मात्मन् स्थातुमिच्छाम शाधि नः ।। १० ।।
**ऋषि बोले—**तात! हम तुम्हारी बात सुनेंगे। तुम्हें सब मार्ग विदित हैं। धर्मात्मन्! हम तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहना चाहते हैं। तुम हमें उपदेश दो ।। १० ।।
शकुनिरुवाच
चतुष्पदां गौः प्रवरा लोहानां काञ्चनं वरम् ।
शब्दानां प्रवरो मन्त्रो ब्राह्मणो द्विपदां वरः ।। ११ ।।
**पक्षीने कहा—**चौपायोंमें गौ श्रेष्ठ है, धातुओंमें सोना उत्तम है, शब्दोंमें मन्त्र उत्कृष्ट है और मनुष्योंमें ब्राह्मण प्रधान है ।। ११ ।।
मन्त्रोऽयं जातकर्मादिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
जीवतोऽपि यथाकालं श्मशाननिधनादिभिः ।। १२ ।।
ब्राह्मणोंके लिये मन्त्रयुक्त जातकर्म आदि संस्कारका विधान है। वह जबतक जीवित रहे, समय-समयपर उसके आवश्यक संस्कार होते रहने चाहिये, मरनेपर भी यथासमय श्मशानभूमिमें अन्त्येष्टिसंस्कार तथा घरपर श्राद्ध आदि वैदिक विधिके अनुसार सम्पन्न होने चाहिये ॥ १२ ॥ कर्माणि वैदिकान्यस्य स्वर्ग्यः पन्थास्त्वनुत्तमः । अथ सर्वाणि कर्माणि मन्त्रसिद्धानि चक्षते ॥ १३ ॥ आम्नायदृढवादीनि तथा सिद्धिरिहेष्यते । मासार्धमासा ऋतव आदित्यशशितारकम् ॥ १४ ॥ ईहन्ते सर्वभूतानि तदिदं कर्मसंज्ञितम् । सिद्धिक्षेत्रमिदं पुण्यमयमेवाश्रमो महान् ॥ १५ ॥ वैदिक कर्म ही ब्राह्मणके लिये स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले उत्तम मार्ग हैं। इसके सिवा, मुनियोंने समस्त कर्मोंको वैदिक मन्त्रोंद्वारा ही सिद्ध होनेवाला बताया है। वेदमें इन कर्मोंका प्रतिपादन दृढ़तापूर्वक किया गया है; इसलिये उन कर्मोंके अनुष्ठानसे ही यहाँ अभीष्ट-सिद्धि होती है। मास, पक्ष, ऋतु, सूर्य, चन्द्रमा और तारोंसे उपलक्षित जो यज्ञ होते हैं, उन्हें यथासम्भव सम्पन्न करनेकी चेष्टा प्रायः सभी प्राणी करते हैं। यज्ञोंका सम्पादन ही कर्म कहलाता है। जहाँ ये कर्म किये जाते हैं, वह गृहस्थ-आश्रम ही सिद्धिका पुण्यमय क्षेत्र है और यही सबसे महान् आश्रम है ॥ १३-१५ ॥ अथ ये कर्म निन्दन्तो मनुष्याः कापथं गताः । मूढानामर्थहीनानां तेषामेनस्तु विद्यते ॥ १६ ॥ जो मनुष्य कर्मकी निन्दा करते हुए कुमार्गका आश्रय लेते हैं, उन पुरुषार्थहीन मूढ़ पुरुषोंको पाप लगता है ॥ १६ ॥ देववंशान् पितृवंशान् ब्रह्मवंशांश्च शाश्वतान् । संत्यज्य मूढा वर्तन्ते ततो यान्त्यश्रुतीपथम् ॥ १७ ॥ देवसमूह और पितृसमूहोंका यजन तथा ब्रह्मवंश (वेद-शास्त्र आदिके स्वाध्यायद्वारा ऋषि-मुनियों)-की तृप्ति—ये तीन ही सनातन मार्ग हैं। जो मूर्ख इनका परित्याग करके और किसी मार्गसे चलते हैं, वे वेदविरुद्ध पथका आश्रय लेते हैं ॥ १७ ॥ एतद्धोऽस्तु तपोयुक्तं ददामीत्यृषिचोदितम् । तस्मात् तत् तद् व्यवस्थानं तपस्वितप उच्यते ॥ १८ ॥ मन्त्रद्रष्टा ऋषिने एक मन्त्रमें कहा है कि 'यह यज्ञरूप कर्म तुम सब यजमानोंद्वारा सम्पादित हो, परंतु यह होना चाहिये तपस्यासे युक्त। तुम इसका अनुष्ठान करोगे तो मैं तुम्हें मनोवांछित फल प्रदान करूँगा।' अतः उन-उन वैदिक कर्मोंमें पूर्णतः संलग्न हो जाना ही तपस्वीका 'तप' कहलाता है ॥ १८ ॥ देववंशान् ब्रह्मवंशान् पितृवंशांश्च शाश्वतान् ।
संविभज्य गुरोश्चर्यां तद् वै दुष्करमुच्यते ॥ १९ ॥ हवन-कर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायद्वारा ब्रह्मर्षियोंको तथा श्राद्धद्वारा सनातन पितरोंको उनका भाग समर्पित करके गुरुकी परिचर्या करना दुष्कर व्रत कहलाता है ॥ १९ ॥
देवा वै दुष्करं कृत्वा विभूतिं परमां गताः । तस्माद् गार्हस्थ्यमुद्वोढुं दुष्करं प्रब्रवीमि वः ॥ २० ॥ इस दुष्कर व्रतका अनुष्ठान करके देवताओंने उत्तम वैभव प्राप्त किया है। यह गृहस्थधर्मका पालन ही दुष्कर व्रत है। मैं तुमलोगोंसे इसी दुष्कर व्रतका भार उठानेके लिये कह रहा हूँ ॥ २० ॥
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशयः । कुटुम्बविधिनानेन यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २१ ॥ तपस्या श्रेष्ठ कर्म है। इसमें संदेह नहीं कि यही प्रजावर्गका मूल कारण है। परंतु गार्हस्थ्यविधायक शास्त्रके अनुसार इस गार्हस्थ्य-धर्ममें ही सारी तपस्या प्रतिष्ठित है ॥ २१ ॥
एतद् विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः । तस्माद् व्रतं मध्यमं तु लोकेषु तप उच्यते ॥ २२ ॥ जिनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं है, जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित हैं, वे ब्राह्मण इसीको तप मानते हैं। यद्यपि लोकमें व्रतको भी तप कहा जाता है, किंतु वह पंचयज्ञके अनुष्ठानकी अपेक्षा मध्यम श्रेणीका है ॥ २२ ॥
दुराधर्षं पदं चैव गच्छन्ति विघसाशिनः । सायंप्रातर्विभज्यान्नं स्वकुटुम्बे यथाविधि ॥ २३ ॥ दत्त्वातिथिभ्यो देवेभ्यः पितृभ्यः स्वजनाय च । अवशिष्टानि येऽश्नन्ति तानाहुर्विघसाशिनः ॥ २४ ॥
महाभारत
सुवर्णमय पक्षीके रूपमें देवराज इन्द्रका संन्यासी बने हुए ब्राह्मण-बालकोंको उपदेश
क्योंकि विघसाशी पुरुष प्रातः-सायंकाल विधि-विधानपूर्वक अपने कुटुम्बमें अन्नका विभाग करके दुर्जय अविनाशी पदको प्राप्त कर लेते हैं। देवताओं, पितरों, अतिथियों तथा अपने परिवारके अन्य सब लोगोंको अन्न देकर जो सबसे पीछे अवशिष्ट अन्न खाते हैं, उन्हें विघसाशी कहा गया है ॥ २३-२४ ॥
तस्मात् स्वधर्ममास्थाय सुव्रताः सत्यवादिनः ।
लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ॥ २५ ॥
इसलिये अपने धर्मपर आरूढ़ हो उत्तम व्रतका पालन और सत्यभाषण करते हुए वे जगद्गुरु होकर सर्वथा संदेहरहित हो जाते हैं ॥ २५ ॥
त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य स्वर्गलोके विमत्सराः ।
वसन्ति शाश्वतान् वर्षाञ्जना दुष्करकारिणः ॥ २६ ॥
वे ईर्ष्यारहित दुष्कर व्रतका पालन करनेवाले पुण्यात्मा पुरुष इन्द्रके स्वर्गलोकमें पहुँचकर अनन्त वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं ॥ २६ ॥
अर्जुन उवाच
ततस्ते तद् वचः श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् ।
उत्सृज्य नास्तीति गता गार्हस्थ्यं समुपाश्रिताः ॥ २७ ॥
अर्जुन कहते हैं— महाराज! वे ब्राह्मणकुमार पक्षिरूपधारी इन्द्रकी धर्म और अर्थयुक्त हितकर बातें सुनकर इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग जिस मार्गपर चल रहे हैं वह हमारे लिये हितकर नहीं है। अतः वे उसे छोड़कर घर लौट गये और गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥
तस्मात्त्वमपि सर्वज्ञ धैर्यमालम्ब्य शाश्वतम् ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां हतामित्रां नरोत्तम ॥ २८ ॥
सर्वज्ञ नरश्रेष्ठ! अतः आप भी सदाके लिये धैर्य धारण करके शत्रुहीन हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कीजिये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये
ऋषिशकुनिसंवादकथने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनके वचनके प्रसंगमें ऋषियों और पक्षिरूपधारी इन्द्रके संवादका वर्णनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना
वैशम्पायन उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमब्रवीत् ।
राजानमभिसम्प्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरम् ।। १ ।।
अनुरुध्य महाप्राज्ञो भ्रातुश्चित्तमरिंदम ।
व्यूढोरस्को महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ।। २ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अर्जुनकी बात सुनकर नकुलने भी सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरकी ओर देखकर कुछ कहनेको उद्यत हुए। शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! महाबाहु नकुल बड़े बुद्धिमान् थे। उनकी छाती चौड़ी, मुख ताम्रवर्णका था। वे बड़े मितभाषी थे। उन्होंने भाईके चित्तका अनुसरण करते हुए कहा ।। १-२ ।।
नकुल उवाच
विशाखयूपे देवानां सर्वेषामग्नयश्चिताः ।
तस्माद् विद्धि महाराज देवाः कर्मफले स्थिताः ।। ३ ।।
नकुल बोले— महाराज! विशाखयूप नामक क्षेत्रमें सम्पूर्ण देवताओंद्वारा की हुई अग्निस्थापनाके चिह्न (ईंटोंकी बनी हुई वेदियाँ) मौजूद हैं। इससे आपको यह समझना चाहिये कि देवता भी वैदिक कर्मों और उनके फलोंपर विश्वास करते हैं ।। ३ ।।
अनास्तिकानां भूतानां प्राणदाः पितरश्च ये ।
तेऽपि कर्मैव कुर्वन्ति विधिं सम्प्रेक्ष्य पार्थिव ।। ४ ।।
राजन्! आस्तिकताकी बुद्धिसे रहित समस्त प्राणियोंके प्राणदाता पितर भी शास्त्रके विधिवाक्योंपर दृष्टि रखकर कर्म ही करते हैं ।। ४ ।।
वेदवादापविद्धांस्तु तान् विद्धि भृशनास्तिकान् ।
न हि वेदोक्तमुत्सृज्य विप्रः सर्वेषु कर्मसु ।। ५ ।।
देवयानेन नाकस्य पृष्ठमाप्नोति भारत ।
भारत! जो वेदोंकी आज्ञाके विरुद्ध चलते हैं, उन्हें बड़ा भारी नास्तिक समझिये। वेदकी आज्ञाका उल्लंघन करके सब प्रकारके कर्म करनेपर भी कोई ब्राह्मण देवयान मार्गके द्वारा स्वर्गलोककी पृष्ठभूमिमें पैर नहीं रख सकता ।। ५ १/२ ।।
अत्याश्रमानयं सर्वानित्याहुर्वेदनिश्चयाः ।। ६ ।।
ब्राह्मणाःश्रुतिसम्पन्नास्तान् निबोध नराधिप । यह गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा है। यह बात वेदोंके सिद्धान्तको जाननेवाले श्रुतिसम्पन्न ब्राह्मण कहते हैं। नरेश्वर! आप उनकी सेवामें उपस्थित होकर इस बातको समझिये ।। ६ १/२ ।। वित्तानि धर्मलब्धानि क्रतुमुख्येष्ववासृजन् ।। ७ ।। कृतात्मा स महाराज स वै त्यागी स्मृतो नरः ।। ८ ।। महाराज! जो धर्मसे प्राप्त किये हुए धनका श्रेष्ठ यज्ञोंमें उपयोग करता है और अपने मनको वशमें रखता है, वह मनुष्य त्यागी माना गया है ।। ७-८ ।। अनवेक्ष्य सुखादानं तथैवोर्ध्वं प्रतिष्ठितः । आत्मत्यागी महाराज स त्यागी तामसो मतः ।। ९ ।। महाराज! जिसने गृहस्थ-आश्रमके सुखभोगोंको कभी नहीं देखा, फिर भी जो ऊपरवाले वानप्रस्थ आदि आश्रमोंमें प्रतिष्ठित होकर देहत्याग करता है, उसे तामस त्यागी माना गया है ।। ९ ।। अनिकेतः परिपतन् वृक्षमूलाश्रयो मुनिः । अपाचकः सदा योगी स त्यागी पार्थ भिक्षुकः ।। १० ।। पार्थ! जिसका कोई घर-बार नहीं, जो इधर-उधर विचरता और चुपचाप किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़पर सो जाता है, जो अपने लिये कभी रसोई नहीं बनाता और सदा योगपरायण रहता है, ऐसे त्यागीको भिक्षुक कहते हैं ।। १० ।। क्रोधहर्षावनादृत्य पैशुन्यं च विशेषतः । विप्रो वेदानधीते यः स त्यागी पार्थ उच्यते ।। ११ ।। कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण क्रोध, हर्ष और विशेषतः चुगलीकी अवहेलना करके सदा वेदोंके स्वाध्यायमें लगा रहता है, वह त्यागी कहलाता है ।। ११ ।। आश्रमांस्तुलया सर्वान् धृतानाहुर्मनीषिणः । एकतश्च त्रयो राजन् गृहस्थाश्रम एकतः ।। १२ ।। राजन्! कहते हैं कि एक समय मनीषी पुरुषोंने चारों आश्रमोंको (विवेकके) तराजूपर रखकर तौला था। एक ओर तो अन्य तीनों आश्रम थे और दूसरी ओर अकेला गृहस्थ-आश्रम था ।। १२ ।। समीक्ष्य तुलया पार्थ कामं स्वर्गं च भारत । अयं पन्था महर्षीणामियं लोकविदां गतिः ।। १३ ।। भरतवंशी नरेश! पार्थ! इस प्रकार विवेककी तुलापर रखकर जब देखा गया तो गृहस्थ-आश्रम ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ; क्योंकि वहाँ भोग और स्वर्ग दोनों सुलभ थे। तबसे उन्होंने निश्चय किया कि ‘यही मुनियोंका मार्ग है और यही लोकवेत्ताओंकी गति है’ ।।
इति यः कुरुते भावं स त्यागी भरतर्षभ । न यः परित्यज्य गृहान् वनमेति विमूढवत् ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! जो ऐसा भाव रखता है, वही त्यागी है। जो मूर्खकी तरह घर छोड़कर वनमें चला जाता है, वह त्यागी नहीं है ॥ १४ ॥ यदा कामान् समीक्षेत धर्मवैतंसिको नरः । अथैनं मृत्युपाशेन कण्ठे बध्नाति मृत्युराट् ॥ १५ ॥ वनमें रहकर भी यदि धर्मध्वजी मनुष्य काम-भोगोंपर दृष्टिपात (उनका स्मरण) करता है तो यमराज उसके गलेमें मौतका फंदा डाल देते हैं ॥ १५ ॥ अभिमानकृतं कर्म नैतत् फलवदुच्यते । त्यागयुक्तं महाराज सर्वमेव महाफलम् ॥ १६ ॥ महाराज! यही कर्म यदि अभिमानपूर्वक किया जाय तो वह सफल नहीं होता, और त्यागपूर्वक किया हुआ सारा कर्म ही महान् फलदायक होता है ॥ १६ ॥ शमो दमस्तथा धैर्यं सत्यं शौचमथार्जवम् । यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ॥ १७ ॥ शम, दम, धैर्य, सत्य, शौच, सरलता, यज्ञ, धृति तथा धर्म—इन सबका ऋषियोंके लिये निरन्तर पालन करनेका विधान है ॥ १७ ॥ पितृदेवातिथिकृते समारम्भोऽत्र शस्यते । अत्रैव हि महाराज त्रिवर्गः केवलं फलम् ॥ १८ ॥ महाराज! गृहस्थ-आश्रममें ही देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके लिये किये जानेवाले आयोजनकी प्रशंसा की जाती है। केवल यहीं धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों सिद्ध होते हैं ॥ १८ ॥ एतस्मिन् वर्तमानस्य विधावप्रतिषेधिते । त्यागिनः प्रसृतस्येह नोच्छित्तिर्विद्यते क्वचित् ॥ १९ ॥ यहाँ रहकर वेदविहित विधिका पालन करनेवाले निष्ठावान् त्यागीका कभी विनाश नहीं होता—वह पारलौकिक उन्नतिसे कभी वञ्चित नहीं रहता ॥ १९ ॥ असृजद्धि प्रजा राजन् प्रजापतिरकल्मषः । मां यक्ष्यन्तीति धर्मात्मा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ॥ २० ॥ राजन्! पापरहित धर्मात्मा प्रजापतिने इस उद्देश्यसे प्रजाओंकी सृष्टि की कि 'ये नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करेंगी' ॥ २० ॥ वीरुधश्चैव वृक्षांश्च यज्ञार्थं वै तथौषधीः । पशूंश्चैव तथा मेध्यान् यज्ञार्थानि हवींषि च ॥ २१ ॥ इसी उद्देश्यसे उन्होंने यज्ञसम्पादनके लिये नाना प्रकारकी लता-वेलों, वृक्षों, ओषधियों, मेध्य पशुओं तथा यज्ञार्थक हविष्योंकी भी सृष्टि की है ॥ २१ ॥
गृहस्थाश्रमिणस्तच्च यज्ञकर्म विरोधकम् । तस्माद् गार्हस्थ्यमेवेह दुष्करं दुर्लभं तथा ॥ २२ ॥ वह यज्ञकर्म गृहस्थाश्रमी पुरुषको एक मर्यादाके भीतर बाँध रखनेवाला है; इसलिये गार्हस्थ्यधर्म ही इस संसारमें दुष्कर और दुर्लभ है ॥ २२ ॥ तत् सम्प्राप्य गृहस्था ये पशुधान्यधनान्विताः । न यजन्ते महाराज शाश्वतं तेषु किल्बिषम् ॥ २३ ॥ महाराज! जो गृहस्थ उसे पाकर पशु और धन-धान्यसे सम्पन्न होते हुए भी यज्ञ नहीं करते हैं, उन्हें सदा ही पापका भागी होना पड़ता है ॥ २३ ॥ स्वाध्याययज्ञा ऋषयो ज्ञानयज्ञास्तथा परे । अथापरे महायज्ञान् मनस्येव वितन्वते ॥ २४ ॥ कुछ ऋषि वेद-शास्त्रोंका स्वाध्यायरूप यज्ञ करनेवाले होते हैं, कुछ ज्ञानयज्ञमें तत्पर रहते हैं और कुछ लोग मनमें ही ध्यानरूपी महान् यज्ञोंका विस्तार करते हैं ॥ २४ ॥ एवं मनःसमाधानं मार्गमातिष्ठतो नृप । द्विजातेर्ब्रह्मभूतस्य स्पृहयन्ति दिवौकसः ॥ २५ ॥ नरेश्वर! चित्तको एकाग्र करना-रूप जो साधन है उसका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत हुए द्विजके दर्शनकी अभिलाषा देवता भी रखते हैं ॥ २५ ॥ स रत्नानि विचित्राणि संहृतानि ततस्ततः । मखेष्वनभिसंत्यज्य नास्तिक्यमभिजल्पसि ॥ २६ ॥ इधर-उधरसे जो विचित्र रत्न संग्रह करके लाये गये हैं, उनका यज्ञोंमें वितरण न करके आप नास्तिकताकी बातें कर रहे हैं ॥ २६ ॥ कुटुम्बमास्थिते त्यागं न पश्यामि नराधिप । राजसूयाश्वमेधेषु सर्वमेधेषु वा पुनः ॥ २७ ॥ नरेश्वर! जिसपर कुटुम्बका भार हो, उसके लिये त्यागका विधान नहीं देखनेमें आता है। उसे तो राजसूय, अश्वमेध अथवा सर्वमेध यज्ञोंमें प्रवृत्त होना चाहिये ॥ २७ ॥ ये चान्ये क्रतवस्तात ब्राह्मणैरभिपूजिताः । तैर्यजस्व महीपाल शक्रो देवपतिर्यथा ॥ २८ ॥ भूपाल! इनके सिवा जो दूसरे भी ब्राह्मणोंद्वारा प्रशंसित यज्ञ हैं, उनके द्वारा देवराज इन्द्रके समान आप भी यज्ञपुरुषकी आराधना कीजिये ॥ २८ ॥ राज्ञः प्रमाददोषेण दस्युभिः परिमुष्यताम् । अशरण्यः प्रजानां यः स राजा कलिरुच्यते ॥ २९ ॥ राजाके प्रमाददोषसे लुटेरे प्रबल होकर प्रजाको लूटने लगते हैं, उस अवस्थामें यदि राजाने प्रजाको शरण नहीं दी तो उसे मूर्तिमान् कलियुग कहा जाता है ॥ २९ ॥ अश्वान् गाश्चैव दासीश्च करेणूश्च स्वलंकृताः ।