महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः
नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना
वैशम्पायन उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमब्रवीत् ।
राजानमभिसम्प्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरम् ।। १ ।।
अनुरुध्य महाप्राज्ञो भ्रातुश्चित्तमरिंदम ।
व्यूढोरस्को महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ।। २ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! अर्जुनकी बात सुनकर नकुलने भी सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरकी ओर देखकर कुछ कहनेको उद्यत हुए। शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! महाबाहु नकुल बड़े बुद्धिमान् थे। उनकी छाती चौड़ी, मुख ताम्रवर्णका था। वे बड़े मितभाषी थे। उन्होंने भाईके चित्तका अनुसरण करते हुए कहा ।। १-२ ।।
नकुल उवाच
विशाखयूपे देवानां सर्वेषामग्नयश्चिताः ।
तस्माद् विद्धि महाराज देवाः कर्मफले स्थिताः ।। ३ ।।
नकुल बोले— महाराज! विशाखयूप नामक क्षेत्रमें सम्पूर्ण देवताओंद्वारा की हुई अग्निस्थापनाके चिह्न (ईंटोंकी बनी हुई वेदियाँ) मौजूद हैं। इससे आपको यह समझना चाहिये कि देवता भी वैदिक कर्मों और उनके फलोंपर विश्वास करते हैं ।। ३ ।।
अनास्तिकानां भूतानां प्राणदाः पितरश्च ये ।
तेऽपि कर्मैव कुर्वन्ति विधिं सम्प्रेक्ष्य पार्थिव ।। ४ ।।
राजन्! आस्तिकताकी बुद्धिसे रहित समस्त प्राणियोंके प्राणदाता पितर भी शास्त्रके विधिवाक्योंपर दृष्टि रखकर कर्म ही करते हैं ।। ४ ।।
वेदवादापविद्धांस्तु तान् विद्धि भृशनास्तिकान् ।
न हि वेदोक्तमुत्सृज्य विप्रः सर्वेषु कर्मसु ।। ५ ।।
देवयानेन नाकस्य पृष्ठमाप्नोति भारत ।
भारत! जो वेदोंकी आज्ञाके विरुद्ध चलते हैं, उन्हें बड़ा भारी नास्तिक समझिये। वेदकी आज्ञाका उल्लंघन करके सब प्रकारके कर्म करनेपर भी कोई ब्राह्मण देवयान मार्गके द्वारा स्वर्गलोककी पृष्ठभूमिमें पैर नहीं रख सकता ।। ५ १/२ ।।
अत्याश्रमानयं सर्वानित्याहुर्वेदनिश्चयाः ।। ६ ।।