महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणाःश्रुतिसम्पन्नास्तान् निबोध नराधिप । यह गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा है। यह बात वेदोंके सिद्धान्तको जाननेवाले श्रुतिसम्पन्न ब्राह्मण कहते हैं। नरेश्वर! आप उनकी सेवामें उपस्थित होकर इस बातको समझिये ।। ६ १/२ ।। वित्तानि धर्मलब्धानि क्रतुमुख्येष्ववासृजन् ।। ७ ।। कृतात्मा स महाराज स वै त्यागी स्मृतो नरः ।। ८ ।। महाराज! जो धर्मसे प्राप्त किये हुए धनका श्रेष्ठ यज्ञोंमें उपयोग करता है और अपने मनको वशमें रखता है, वह मनुष्य त्यागी माना गया है ।। ७-८ ।। अनवेक्ष्य सुखादानं तथैवोर्ध्वं प्रतिष्ठितः । आत्मत्यागी महाराज स त्यागी तामसो मतः ।। ९ ।। महाराज! जिसने गृहस्थ-आश्रमके सुखभोगोंको कभी नहीं देखा, फिर भी जो ऊपरवाले वानप्रस्थ आदि आश्रमोंमें प्रतिष्ठित होकर देहत्याग करता है, उसे तामस त्यागी माना गया है ।। ९ ।। अनिकेतः परिपतन् वृक्षमूलाश्रयो मुनिः । अपाचकः सदा योगी स त्यागी पार्थ भिक्षुकः ।। १० ।। पार्थ! जिसका कोई घर-बार नहीं, जो इधर-उधर विचरता और चुपचाप किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़पर सो जाता है, जो अपने लिये कभी रसोई नहीं बनाता और सदा योगपरायण रहता है, ऐसे त्यागीको भिक्षुक कहते हैं ।। १० ।। क्रोधहर्षावनादृत्य पैशुन्यं च विशेषतः । विप्रो वेदानधीते यः स त्यागी पार्थ उच्यते ।। ११ ।। कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण क्रोध, हर्ष और विशेषतः चुगलीकी अवहेलना करके सदा वेदोंके स्वाध्यायमें लगा रहता है, वह त्यागी कहलाता है ।। ११ ।। आश्रमांस्तुलया सर्वान् धृतानाहुर्मनीषिणः । एकतश्च त्रयो राजन् गृहस्थाश्रम एकतः ।। १२ ।। राजन्! कहते हैं कि एक समय मनीषी पुरुषोंने चारों आश्रमोंको (विवेकके) तराजूपर रखकर तौला था। एक ओर तो अन्य तीनों आश्रम थे और दूसरी ओर अकेला गृहस्थ-आश्रम था ।। १२ ।। समीक्ष्य तुलया पार्थ कामं स्वर्गं च भारत । अयं पन्था महर्षीणामियं लोकविदां गतिः ।। १३ ।। भरतवंशी नरेश! पार्थ! इस प्रकार विवेककी तुलापर रखकर जब देखा गया तो गृहस्थ-आश्रम ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ; क्योंकि वहाँ भोग और स्वर्ग दोनों सुलभ थे। तबसे उन्होंने निश्चय किया कि ‘यही मुनियोंका मार्ग है और यही लोकवेत्ताओंकी गति है’ ।।