भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

वयं हि बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । क्लीबस्य वाक्ये तिष्ठामो यथैवाशक्तयस्तथा ॥ १५ ॥ हम बाहुबलसे सम्पन्न, अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् और मनस्वी हैं तो भी असमर्थ पुरुषोंके समान एक कायर भाईकी आज्ञामें रहते हैं ॥ १५ ॥

अगतीकगतीनस्मान् नष्टार्थानर्थसिद्धये । कथं वै नानुपश्येयुर्जनाः पश्यत यादृशम् ॥ १६ ॥ हमलोग पहले अशरण मनुष्योंको शरण देनेवाले थे; किंतु अब हमारा ही अर्थ नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें अर्थसिद्धिके लिये हमारा आश्रय लेनेवाले लोग हमारी इस दुर्बलतापर कैसे दृष्टि नहीं डालेंगे? बन्धुओ! मेरा कथन कैसा है? इसपर विचार करो ॥ १६ ॥

आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते । जरयाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यसितेन वा ॥ १७ ॥ शास्त्रका उपदेश यह है कि आपत्तिकालमें या बुढ़ापेसे जर्जर हो जानेपर अथवा शत्रुओंद्धारा धन-सम्पत्तिसे वञ्चित कर दिये जानेपर मनुष्यको संन्यास ग्रहण करना चाहिये ॥ १७ ॥

तस्मादिह कृतप्रज्ञास्त्यागं न परिचक्षते । धर्मव्यतिक्रमं चैव मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ॥ १८ ॥ अतः (जब कि हमारे ऊपर पूर्वोक्त संकट नहीं आया है) विद्वान् पुरुष ऐसे अवसरमें त्याग या संन्यासकी प्रशंसा नहीं करते हैं। सूक्ष्मदर्शी पुरुष तो ऐसे समयमें क्षत्रियके लिये संन्यास लेना उलटे धर्मका उल्लंघन मानते हैं ॥ १८ ॥

कथं तस्मात् समुत्पन्नास्तन्निष्ठास्तदुपाश्रयाः । तदेव निन्दां भाषेषुर्धाता तत्र न गर्ह्यते ॥ १९ ॥ इसलिये जिनकी क्षात्रधर्मके लिये उत्पत्ति हुई है, जो क्षात्रधर्ममें ही तत्पर रहते हैं, तथा क्षात्रधर्मका ही आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे क्षत्रिय स्वयं ही उस क्षात्रधर्मकी निन्दा कैसे कर सकते हैं? इसके लिये उस विधाताकी ही निन्दा क्यों न की जाय, जिन्होंने क्षत्रियोंके लिये युद्धधर्मका विधान किया है ॥ १९ ॥

श्रिया विहीनैर्धनैर्नास्तिकैः सम्प्रवर्तितम् । वेदवादस्य विज्ञानं सत्याभासमिवानृतम् ॥ २० ॥ श्रीहीन, निर्धन एवं नास्तिकोंने वेदके अर्थवादवाक्यों द्वारा प्रतिपादित विज्ञानका आश्रय ले सत्य-सा प्रतीत होनेवाले मिथ्या मतका प्रचार किया है (वैसे वचनोंद्वारा क्षत्रियका संन्यासमें अधिकार नहीं सिद्ध होता है) ॥ २० ॥

शक्यं तु मौनमास्थाय बिभ्रताऽऽत्मानमात्मना । धर्मच्छद्म समास्थाय च्यवितुं न तु जीवितुम् ॥ २१ ॥