भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 81

हन्तव्यास्त इति प्राज्ञाः क्षत्रधर्मविदो विदुः ॥ ७ ॥
क्षत्रिय-धर्मके ज्ञाता विद्वान् पुरुष यह जानते और बताते हैं कि अपना राज्य ग्रहण करते समय जो कोई भी उसमें बाधक या विरोधी खड़े हों, उन्हें मार डालना चाहिये ॥ ७ ॥

ते सदोषा हतास्माभी राज्यस्य परिपन्थिनः ।
तान् हत्वा भुङ्क्ष्व धर्मेण युधिष्ठिर महीमिमाम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग हमारे राज्यके बाधक या लुटेरे थे, वे सभी अपराधी ही थे; अतः हमने उन्हें मार डाला। उन्हें मारकर धर्मतः प्राप्त हुई इस पृथ्वीका आप उपभोग कीजिये ॥ ८ ॥

यथा हि पुरुषः खात्वा कूपमप्राप्य चोदकम् ।
पङ्कदिग्धो निवर्तेत कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ ९ ॥
जैसे कोई मनुष्य परिश्रम करके कुँआ खोदे और वहाँ जल न मिलनेपर देहमें कीचड़ लपेटे हुए वहाँसे निराश लौट आये, उसी प्रकार हमारा किया-कराया यह सारा पराक्रम व्यर्थ होना चाहता है ॥ ९ ॥

यथाऽऽरुह्य महावृक्षमपहृत्य ततो मधु ।
अप्राश्य निधनं गच्छेत् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १० ॥
जैसे कोई विशाल वृक्षपर आरूढ़ हो वहाँसे मधु उतार लाये परंतु उसे खानेके पूर्व ही उसकी मृत्यु हो जाय; हमारा यह प्रयत्न भी वैसा ही हो रहा है ॥ १० ॥

यथा महान्तमध्वानमाशया पुरुषः पतन् ।
स निराशो निवर्तेत कर्मैतन्नस्तथोपमम् ॥ ११ ॥
जैसे कोई मनुष्य मनमें कोई आशा लेकर बहुत बड़ा मार्ग तय करे और वहाँ पहुँचनेपर निराश लौटे, हमारा यह कार्य भी उसी तरह निष्फल हो रहा है ॥ ११ ॥

यथा शत्रून् घातयित्वा पुरुषः कुरुनन्दन ।
आत्मानं घातयेत् पश्चात् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! जैसे कोई मनुष्य शत्रुओंका वध करनेके पश्चात् अपनी भी हत्या कर डाले, हमारा यह कर्म भी वैसा ही है ॥ १२ ॥

यथान्नं क्षुधितो लब्ध्वा न भुञ्जीयाद् यदृच्छया ।
कामीव कामिनीं लब्ध्वा कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १३ ॥
जैसे भूखा मनुष्य भोजन और कामी पुरुष कामिनीको पाकर दैववश उसका उपभोग न करे, हमारा यह कर्म भी वैसा ही निष्फल हो रहा है ॥ १३ ॥

वयमेवात्र गर्ह्या हि यद् वयं मन्दचेतसम् ।
त्वां राजन्ननुगच्छामो ज्येष्ठोऽयमिति भारत ॥ १४ ॥
भरतवंशी नरेश! हमलोग ही यहाँ निन्दाके पात्र हैं कि आप-जैसे अल्पबुद्धि पुरुषको बड़ा भाई समझकर आपके पीछे-पीछे चलते हैं ॥ १४ ॥